आख़िर केकरा बनैते अपन सिरमौर राष्ट्रकवि दिनकर की जमीं ‘बेगूसराय’

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अगर कहें कि 2019 के लोकसभा चुनाव में समूचे देश के महत्वपूर्ण और चर्चित क्षेत्रों में से राष्ट्रकवि दिनकर की भूमि बेगूसराय भी एक है तो यह अतिश्योक्ति नहीं होगी। यूँ तो चर्चित होने के कई कारण हैं लेकिन उनमें से कुछ आपको बताना आवश्यक है। बेगूसराय लोकसभा के चर्चा में होने का सबसे प्रमुख कारण भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के उम्मीदवार कन्हैया कुमार हैं। कन्हैया कुमार बीते वर्षों JNU में हुये घटनाक्रम से चर्चा में आए। JNU के इस छात्र नेता के अनुसार JNU में हुये घटनाक्रम के बाद सरकार की कार्यशैली ने मुझे मुख्य धारा की राजनीति में आकर, सरकार की नीतियों को जबाब देने को मजबूर किया। और इन्हीं वजह से मैंने उस घटनाक्रम के बाद किसी भी मसले को लेकर अपनी बात बेबाकी से समूचे देश में बताने का कार्य किया और उसी का परिणाम है कि मुझे (कन्हैया कुमार) समूचे देश से समर्थन मिल रहा है। कन्हैया कुमार के बेगूसराय लोकसभा से भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के टिकट पर अपनी उम्मीदवारी के ऐलान के बाद से वाकई कई बड़ी हस्तियाँ उनके समर्थन में खड़े दिखे। एक और महत्वपूर्ण चर्चित बात जो 2019 के लोकसभा चुनाव में रहा वह कि चुनाव आयोग ने उम्मीदवारों के चुनाव खर्च की अधिकतम सीमा 70 लाख तय की है और क्राउड फंडिंग के जरिये 70 लाख रुपए चंदा के रूप में जमा करने वाले वो समूचे भारत में अकेले उम्मीदवार / शख़्सियत हैं।

बेगूसराय लोकसभा के चर्चा में होने का दूसरा प्रमुख कारण भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता और मंत्री गिरिराज सिंह हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव में गिरिराज सिंह बेगूसराय लोकसभा से उम्मीदवारी चाहते थे लेकिन उन्हें नवादा से भारतीय जनता पार्टी ने उम्मीदवार बनाया और वह वहाँ से जीत संसद पहुँचे, किन्तु 2019 में जब गिरिराज सिंह नवादा लोकसभा से उम्मीदवारी चाहते थे तो यह सीट NDA की ओर से लोजपा के खाते में चले जाने के कारण उन्हें भारतीय जनता पार्टी ने बेगूसराय लोकसभा से उम्मीदवार बनाया गया। वो जिद पर अड़े थे कि हमें बताया तक नहीं गया और मेरे साथ ऐसा किया गया हम तो नवादा से ही लड़ेंगे, बेगूसराय से नहीं लेकिन 2-3 दिन के घटनाक्रम के बाद पार्टी आलाकमान से बातचीत के बाद आखिरकार मान गए और अपने दल-बल के साथ राष्ट्रकवि दिनकर की भूमि पर अपनी जीत के लिए संघर्ष करते दिख रहे हैं।

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बेगूसराय लोकसभा के चर्चा में होने का तीसरा प्रमुख कारण महागठबंधन की और से राजद उम्मीदवार तनवीर हसन हैं। तनवीर हसन का चर्चा में नहीं होना ही चर्चा का विषय है। 2014 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के भोला सिंह से लगभग 1.5 लाख वोटों से हारने वाले तनवीर हसन ने हारकर भी 3,69,892 वोट लाया जो कुल आबादी का लगभग 34% है। साथ ही 2014 और 2019 के महागठबंधन का आकलन करें तो यह कागजी तौर पर थोड़ा मजबूत दिख रहा है। तनवीर हसन इसलिए गुस्से में आ जाते हैं कि पुराना रिकॉर्ड के बाबजूद तथाकथित दिल्ली वाली मीडिया उन्हें दौर में मानने को तैयार नहीं है।

बेगूसराय लोकसभा के अंतर्गत आने वाले विधानसभा और वहाँ पार्टियों की स्थिति जान लेते हैं:-

 

  1. चेरिया बरियारपुर कुमारी मंजू वर्मा (जदयू)
  2. बछवाड़ा रामदेव राय (काँग्रेस)
  3. तेघड़ा बीरेंद्र कुमार (राजद)
  4. मटिहानी नरेंद्र कुमार सिंह (जदयू)
  5. साहेबपुर कमाल श्री नारायण यादव (राजद)
  6. बेगूसराय अमिता भूषण (काँग्रेस)
  7. बखरी उपेंद्र पासवान (राजद)

      “देखो 2015 के विधानसभा और 2014 लोकसभा चुनाव सब के परिणाम पर मत जईहियों। हम एक टा मुख्य बात बताबे छिया कि अभी वाला लोकसभा चुनाव में सब कुछ नया छै, जे पुराना छै, वू छै बस तनवीर हसन। बिहार छिये ते यहाँ जातिगत कार्ड नै चलते, यी कदापि संभव नै छै, लेकिन यी भी बताई दै छिया कि बिहार सिर्फ जातिगत वाला नै, बल्कि आंदोलन के शुरुआत के भी भूमि रहले हन, चंपारण याद छा कि नै।”

पहले जातिगत स्थिति जान लै छिये-

  1. भूमियार- 4.75 लाख
  2. यादव- 50 लाख
  3. मुस्लिम- 2.50 लाख
  4. कुर्मी – 00 लाख

 

जातिगत समीकरण के आधार के अगर बात करबे ते, एक तरफ महागठबंधन के उम्मीदवार तनवीर हसन के मुख्यरूप से यादव और मुस्लिम के साथ मिले के चाही और NDA के उम्मीदवार गिरिराज सिंह के भूमियार और कुर्मी के और यी आधार पर देखल जाए ते गिरिराज सिंह के राह आसान लागे छै, लेकिन इतने आसान रहते राहे, ते एकरा राजनीति किया कहे छिये?

भारतीय संसदीय इतिहास में चौथे लोकसभा चुनाव (1967 योगेंद्र शर्मा, भाकपा) को छोड़ दिया जाए तो भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने बेगूसराय लोकसभा भले जीत नहीं पाई है किन्तु भाकपा को 1.5-2.0 लाख के आस-पास वोट आते रहे हैं। यूँ तो इस बार काफी प्रयास किया जा रहा था कि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी को महागठबंधन से बेगूसराय सीट दिया जाय लेकिन बात नहीं बन पाने के कारण महागठबंधन से अलग भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने कन्हैया कुमार को अपना उम्मीदवार बनाया। और इस प्रकार मुक़ाबला त्रिकोणीय हो गया है।

 

गिरिराज सिंह

 

29 अप्रैल 2019 को इस महापर्व के चौथे चरण में भारत के चर्चित सीटों में से एक बेगूसराय में भी मतदान होना है और हार-जीत के नज़रिए से देखा जाए तो NDA से भाजपा उम्मीदवार गिरिराज सिंह काफी मजबूत दिख रहे हैं, एक ख़ास तबके में उनकी अपनी एक अलग छवि होने के साथ-साथ, नवादा संसदीय क्षेत्र में 2014-2019 के अपने कार्यकाल में किए गए विकास कार्य के आलावा मुख्यमंत्री नितीश कुमार और प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी का बहुमूल्य समर्थन प्राप्त है। अगर जातिगत आधार की भी बात की जाय तो वह उसमें भी फिट हो रहे हैं, आमतौर पर भूमियार जाति (4.75 लाख वोटर) का साथ NDA को मिलता रहा है और गिरिराज सिंह भी भूमियार जाति से आते हैं, साथ ही मुख्यमंत्री नितीश कुमार का साथ होने के कारण कुर्मी (2.00 लाख वोटर) जाति का भी साथ मिलने की भरपूर संभावना है, और बची-खुची कमी और विरोधियों के खेमें में बढ़ते प्रचारक को देखते हुये भाजपा ने भी अपनी पूरी ताकत झोंक दी है।

कन्हैया कुमार

 

बेगूसराय लोकसभा चुनाव को देखते हुये एक बार फिर यक़ीन हो गया कि प्रचार में काफी दम होता है और यदि कुछ समय की बात हो तो आपको, आपके विचार से प्रचार और विभिन्न प्रकार के ख़बर पेश कर भ्रमित किया जा सकता है। आज से लगभग 15 दिन पहले की बात की जाए तो राष्ट्रीय मीडिया जमीनी हक़ीक़त से काफी दूर कुछ बड़े-बड़े रिपोर्टर के रिपोर्ट और कन्हैया कुमार के नाम और आए दिन टीवी पर या किसी कार्यक्रम में उनके वक्तव्य के आधार पर तनवीर हसन (3,69,892 वोट के साथ दूसरे स्थान पर रहने वाले तथा जातीय समीकरण में भी फिट बैठने वाले) को मुक़ाबले में मानने को तैयार नहीं थे और उसका परिणाम हुआ कि कन्हैया कुमार ने मुक़ाबले को त्रिकोणीय बना दिया। कन्हैया कुमार का नाम JNU में हुये घटनाक्रम के बाद सामने आया और उसके बाद समूचे भारत में उन्हें भाजपा के विरोधी खेमें का भरपूर सहयोग मिला और उन्होंने समय-समय पर उस मौके का फाइदा उठा अपनी तार्किक और विश्लेषण क्षमता के आधार अपने आप को एक प्रखर वक्ता के रूप में प्रतिष्ठापित किया है और आज उसी का परिणाम है “चाहे वो क्राउड फंडिंग के जरिये 70 लाख रुपए चंदा के रूप में जमा करने का मामला हो या फिर बड़े-बड़े नामचीन कलाकार उसके प्रचार के लिए बेगूसराय आने का मामला हो”। प्रमुख कलाकार जो उनके प्रचार अभियान में शिरकत हुये हैं उनमें स्वरा भास्कर, प्रकाश राज, जावेद अखतर और समाजसेवी और राजनीतिक विश्लेषक योगेंद्र यादव आदि के साथ-साथ कम्युनिस्ट पार्टी के वरिष्ठ नेता शामिल रहे हैं। इसी क्रम में प्रख्यात गीतकार जावेद अखतर का बयान जिसमें उनको बेगूसराय के मुसलमान से यह अपील करते दिखया गया है कि “मुसलमान तनवीर हसन को अपना वोट देकर बर्बाद करने के बजाय कन्हैया कुमार को अपना समर्थन दें”, की काफी चर्चा हुई है। साथ ही कन्हैया कुमार को भी स्थानीय और भूमियार जाति का उम्मीदवार होने का फाइदा मिल सकता है।

तनवीर हसन

 

महागठबंधन की और से राजद उम्मीदवार तनवीर हसन मुख्यरूप से महागठबंधन के तथाकथित वोटबैंक या समीकरण MY (मुस्लिम+यादव) अथवा नवीन गठित MUNIYA (मुस्लिम+निषाद+यादव) पर निर्भर हैं। स्थानीय होने तथा 2014 के लोकसभा चुनाव में भी 3,69,892 वोट लाकर उन्होंने अपने प्रभाव को दिखा दिया है।

यी ते भेला दीर्घउत्तरीय विश्लेषण लेकिन वस्तुनिष्ठ प्रश्न के जमाना में तुहों चाहे होभो कि आख़िर जीतते के यी बताबा- ते चला जमीनी रिपोर्ट के आधार पर बताबै छीया कि लोग सब के मत में अभी भी काफी बदलाव के संभावना छा और NDA के उम्मीदवार गिरिराज सिंह के जीत महागठबंधन के तनवीर हसन के मिलल मुस्लिम वोट और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के कन्हैया कुमार के जीत यी बात पर निर्भर करते कि भूमियार और मुस्लिम के केतना वोट कन्हैया अपन ओजस्वी भाषण और बड़-बड़ हस्ती के मदद से अपना तरफ खीच सकते। यी चुनाव में राष्ट्रीय मीडिया सबसे बड़ा नाइंसाफी अगर केकरो साथ करलके, ते वू छिए महागठबंधन के तनवीर हसन। राष्ट्रीय मीडिया के द्वारा तनवीर हसन के बारे में आम जनमानस के बतैनाय कि  वो दौर में हैं ही नहीं और उसके वजह से आम जनमानस के मत में भी गहरा प्रभाव साफ दिखाई पड़े छै और इस सब के वजह से अब बेचारा के तीसरा नंबर पर आबे के भरपूर संभावना छै।

Pic Source- Google Image

 

 

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