“बेखबर से हम”

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“प्रिया सिन्हा”
कोसी की आस@पूर्णियाँ

“हम कभी थोड़ा बेखबर रहते हैं,
तो कभी सबकी खबर रखते हैं;
कुछ इस तरह सबकी जानकारी,
हम तो शब-ओ-सहर रखते हैं !

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रहते तो हैं हम भी कभी ओझल,
जरूर हीं इस दुनिया की नजरों से,
लेकिन हरेक लोगों के नजरिए पे हम,
अपनी पैनी निगाह-ए-नजर रखते हैं !

यूं तो बख्शते हैं मान-ओ-इज्जत हम,
सदा हीं अपने हर दिल-ए-अजीज को,
लेकिन करते नहीं गुफ्तगू उस शख्स से जो,
जुबां पे शहद व दिल में अपने जहर रखते हैं !

कुछ यूं है बनाया हमने तो अपने किरदार को,
बेशक कोई याद करें ना करें हमें सबके सामने,
लेकिन भूला भी ना पाएंगे वो तो कभी भी हमें,
इतना यकीन तो खुद पे हम मगर रखते हैं !”

(शब = शाम , सहर = सुबह)
(गुफ्तगू = बातचीत, शख्स = व्यक्ति)

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