“एक असफलता ने सफलता की सीढ़ियाँ बना दी”, बेहद गरीब परिवार के बच्चे के ISRO में वैज्ञानिक बनने की कहानी

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कोसी की आस” टीम आज अपने प्रेरक कहानी शृंखला की 16 वीं कड़ी में आपके सामने एक ऐसे युवा की कहानी प्रस्तुत करने जा रही है जिन्हें अपने बचपन की मासूमियत में मिली पहली असफलता ने झकझोर कर रख दिया। और उस बचपन में जब बच्चों को कॅरियर आदि की ज्यादा समझ नहीं होती, उसी वक्त उन्होंने अपने परिवार के लिए कुछ अच्छा करने का मन-ही-मन प्रण लिया ताकि घर वालों को गरीबी से बाहर निकाल सकूँ।

कोसी की आस” टीम आज जो कहानी आपको बताने जा रही है, वो एक जुनून की कहानी है, “एक जुनून कि घर वालों को मुश्किल से निकाल सकूँ”, “एक जुनून कि घर वालों को बेहतर जीवन दे सकूँ”, “एक जुनून कि मेरे सफलता के लिए उनके समर्पण को सम्मान दिला सकूँ”।

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वो कहते हैं न कि “कब किसके जीवन में कौन सा पल आ जाय और उसकी ज़िंदगी को बदल कर रख दे कोई नहीं जनता”, आज हम जिनकी कहानी बताने जा रहे हैं उनने जीवन में भी कुछ इसी तरह हुआ, एक घटना ने उनके जीवन को बदल कर रख दिया। 6ठवीं कक्षा में नवोदय विद्यालय में नामांकन के लिए प्रवेश परीक्षा में असफलता ने उन्हें ऐसा झकझोरा कि फिर वो पलट कर नहीं देख पाये और उस असफलता को सीढ़ी बनाते हुये सफलता की पथ पर लगातार अग्रसर हैं।

उनके जुनून के लिए  माइकल  जार्डन की पंक्ति समर्पित करना चाहूँगा कि

 

मैं  असफलता  को  स्वीकार  कर  सकता  हूँ,

हर  कोई  किसी ना  किसी  चीज  में  विफल  होता  है,

लेकिन  मैं  प्रयास  ना  करूँ,  नहीं  स्वीकार  कर  सकता”।

 

 

कुमार शिवम

 

  आइये जानते हैं ऐसे ही होनहार, मेहनती और कई युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत धबौली, सहरसा के श्री जयशंकर सिंह और श्रीमती वीणा सिंह के सुपुत्र ”कुमार शिवम” से “कोसी की आस” टीम के बातचीत के प्रमुख अंश :-

 

  1. व्यक्तिगत परिचय

 

नाम            :-       कुमार शिवम

पिता&माता का नाम:-      श्री जयशंकर सिंह & श्रीमती वीणा सिंह

शिक्षा:- 10वीं     :-       10वीं गढ़बनेली उच्च विद्यालय पूर्णिया।

 

             12वीं     :-            12वीं सायंस कॉलेज पटना।

      स्नातक   :-        B. Tech. (Electronics & Communication) NIT जमशेदपुर।

2. ग्राम :- धबौली।

3 जिला         :-         सहरसा।

 

  1. पूर्व में चयन :- Engineer (Adani Power).

 

  1. वर्तमान पद :- Scientist / Engineer – in U. R. Rao Satellite Centre of “Indian Space Research Organisation” (ISRO).
  2. अभिरुचि:- अंतरिक्ष विज्ञान, अर्थशास्त्र, क्रिकेट, सिनेमा आदि।
  3. किस शिक्षण संस्थान से आपने तैयारी की:- ISRO में चयन के लिए मैंने किसी संस्थान के बजाय खुद से ही तैयारी किया लेकिन हाँ, 12 वीं के साथ-साथ इंजीनियरिंग में नामांकन की परीक्षा के लिए निजी संस्थानों से मदद लिया था।
  4. आपको इसकी तैयारी के लिए प्रेरणा कहाँ से मिला:- सच कहूँ तो मेरे लिए सबसे बड़ी प्रेरणा थी, परिवार की “कमजोर आर्थिक हालात जिसने मुझे पग-पग या फिर यूँ कहें कि हर एक ठोकर पर अपने परिवार के लिए कुछ कर गुजरने का जुनून बन हमेशा प्रेरित करता रहता। और उसी क्रम में “एक लक्ष्य पाता गया, मंजिल बढ़ाता गया” को सिद्धांत बना लिया।
  5. आप इस सफलता का श्रेय किसे देना चाहते हैं:- दादी, पापा, मम्मी, चाचा, पापा के दोस्त श्री गौरी शंकर सिंह और भैया श्री पुनीत पुष्कर ने मेरी अच्छी शिक्षा के लिए बहुत संघर्ष किया और आज मैं जो कुछ भी हूँ, इन सभी के मेरे शिक्षा के प्रति समर्पण से। मैं अपनी सफलता का पूरा श्रेय इन सभी को देना चाहूँगा।

 

दायें से दूसरे कुमार शिवम

 

 

  1. वर्तमान में प्रयासरत युवाओं के लिए आप क्या संदेश देना चाहेंगे:- इस प्रश्न के जबाब में “श्री शिवम” ने बहुत ही सौम्य तरीके से और धीरे से जो बड़ी बात कह दी उसे साझा कर रहा हूँ

i.) सबसे पहले एक स्पष्ट बात कि “जीवन में यदि कुछ करना है, तो मेहनत करना ही पड़ेगा” और इस बात को हम जितना जल्दी समझ लें उतना अच्छा है। महान वैज्ञानिक और पूर्व राष्ट्रपति माननीय अब्दुल कलाम की पंक्ति दुहराना चाहूँगा कि “अगर तुम सूरज की तरह चमकना चाहते हो तो, पहले सूरज की तरह जलना सीखो”।

आप सबने अपने आस-पास सुना या देखा होगा कि जो व्यक्ति बचपन में अपने लक्ष्य को छोड़ मस्ती में लगे रहते थे, वे आज तक अपनी परिवार को सामान्य जीवन भी उपलब्ध कराने के लिए काफी संघर्ष कर रहे हैं। अतः हम सबको समझना होगा कि बचपन के कुछ वर्षों के मेहनत से न सिर्फ मेरा बल्कि मेरे परिवार की ज़िंदगी हमेशा-हमेशा के लिए अच्छी हो सकती है।

ii.) दूसरी सबसे महत्वपूर्ण बात कि लक्ष्य निर्धारण के पूर्व उस लक्ष्य के बारे में पढ़ें और फिर आत्म-आकलन कर तय करें कि मैं मेहनत कर इस लक्ष्य के करीब जा सकता हूँ? साथ ही एक बात आपलोगों से साझा करना चाहता हूँ कि आपने कितना भी मेहनत क्यों न किया हो, अगर सफलता नहीं मिली तो उसका बहुत औचित्य नहीं है। इसलिए लक्ष्य चुनने के वक्त अपनी क्षमता का ख़याल रखना बेहद आवश्यक है, अपने अंदर के सारे सकारात्मक और नकारात्मक क्षमता को ध्यान में रखते हुये अपना लक्ष्य तय करें। और जब आपने एक बार लक्ष्य तय कर लिया फिर जितना मेहनत कर सकते हैं कर दीजिये। प्रत्येक दिन अपने-आपसे उस लक्ष्य को पाने के पथ में प्रतियोगी बनें। नकारात्मक प्रतियोगिता का हिस्सा बनने से बचें।

iii.) सफलता पाने के लिए लगातार प्रयास करना अत्यावश्यक है। लक्ष्य निर्धारण के बाद कुछ दिन खूब पढ़ना और फिर कुछ दिन का ब्रेक लेकर, आप सफलता नहीं प्राप्त कर सकते बल्कि कम समय पढ़ें किन्तु लगातार पढ़ें और तब तक पढ़ते रहें, जब तक कि सफलता की चाभी न मिल जाए।

iv.) एक सामान्य (बेसिक) जानकारी प्राप्त करने के उपरांत स्व-अध्याय पर भरोसा रखें, इससे बेहतर कुछ भी नहीं।

  1. अपनी सफलता की राह में आनेवाली कठिनाई के बारे में बताएं:- पापा साधारण किसान और मम्मी गृहणी थी। गाँव के विद्यालय में शिक्षण और मार्गदर्शन का काफी आभाव था और घर की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं होने के किसी अच्छे विद्यालय में नामांकन मुश्किल था, इसलिए गाँव के ही विद्यालय में नामांकन करवाना पड़ा। लेकिन विद्यालय में पढ़ाई ठीक से नहीं होने के कारण मैं घर पर ही पढ़ता, गाँव में रहने पर चाचा श्री ओम शंकर सिंह और गाँव के ही गणित विषय के शिक्षक स्व॰ नंदन ठाकुर सर से पढ़ा था।

उसी वक्त की बात है मेरे फुफेरे भैया स्व॰ श्री सुधांशु शेखर ने नवोदय विद्यालय में नामांकन के लिए प्रवेश परीक्षा पास किया था। नवोदय विद्यालय की पढ़ाई अच्छी थी और साथ में रहना, खाना भी निःशुल्क। साथ ही नवोदय विद्यालय में नामांकन के लिए प्रवेश परीक्षा पास करना भी एक उपलब्धि माना जाता था, इसलिए मेरे पापा-मम्मी भी घर की आर्थिक स्थिति और अच्छी पढ़ाई के कारण चाहते थे कि मैं भी नवोदय में जाऊँ (इस सोच के पीछे अच्छी पढ़ाई के साथ-साथ रहना, खाना निःशुल्क ज्यादा महत्वपूर्ण था)। मैंने नवोदय विद्यालय में नामांकन के लिए प्रवेश परीक्षा की तैयारी की लेकिन प्रवेश परीक्षा पास नहीं कर पाया। परीक्षा परिणाम से घर में सभी दुखी थे और परीक्षा परिणाम वाले दिन मेरे घर का दृश्य ने मुझे झकझोर दिया, मुझे बहुत बुरा लग रहा था क्योंकि अब तक मैं भी अपने-आपको पढ़ने में अच्छा समझता था। खैर, उससे आगे निकलने और अधिक मेहनत करने का निर्णय किया।

संयोगवश चाचा की नौकरी पूर्णिया में लग गई साथ ही बुआ भी वहीं रहती थी, इसलिए मुझे पूर्णिया जाकर पढ़ने का मौका मिल गया। मैंने 7वीं में पहली बार विद्यालय जाना प्रारंभ किया। यह विद्यालय भी पढ़ाई के मामले में साधारण ही था किन्तु गाँव के मुक़ाबले में बेहतर था। घर के आर्थिक हालात अच्छे नहीं होने के कारण पूर्णिया में भी अच्छे प्राइवेट स्कूल में नहीं जा सका। नवोदय विद्यालय में नामांकन के लिए प्रवेश परीक्षा में ना होना मुझे बार-बार खटकता था। मैं अपने इस असफलता से सीख, ज्यादा-से-ज्यादा मेहनत कर अच्छा करना चाहता था। मैं अपने कक्षा में प्रथम आने लगा तथा 2003 में “बिहार विद्यालय परीक्षा समिति द्वारा आयोजित 10वीं की परीक्षा में पुर्णिया जिले में प्रथम स्थान” प्राप्त किया। इस परीक्षा परिणाम से मेरे घर वालों का मेरे पर विश्वास बढ़ गया और पापा ने मुझे किसी भी परिस्थिति का सामना कर आगे पढ़ाने का निश्चय किया।

 

 

सबसे दायें कुमार शिवम

 

 

“पढ़ाई के लिए ना पैसा था और ना ही कोई सही मार्गदर्शन करने वाला” क्योंकि परिवार और रिश्तेदार में अब तक कोई इंजीनियर, डॉक्टर या अन्य किसी भी अच्छे पद पर नहीं पहुंचा था। मैं गणित में अच्छा था इसलिए इंजीनियरिंग को चुना। अच्छे मार्क्स होने के कारण “साइंस कॉलेज पटना” में एडमिशन हो गया। मैं पढ़ाई के लिए पटना में रहने लगा। पटना में पढ़ाई का खर्चा बहुत ज्यादा था और बहुत कोशिश के बाद भी पापा के लिए पैसे दे पाना मुश्किल था, फिर गाँव में पापा के मित्र श्री गौरी शंकर सिंह ने बहुत मदद किया और गाँव के ही पापा के मित्र श्री प्रकाश चंद्र झा पटना में रहते थे और जरूरत पड़ने पर वे मदद किया करते थे। पटना में भी अर्थाभाव होने के कारण काफी मुश्किल हुआ पर जैसी भी परिस्थिति रही हो मैंने अपना मेहनत जारी रखा और अपने पहले ही प्रयास में AIEEE में अच्छे रैंक लाकर NIT जमशेदपुर” में नामांकन ले लिया। वहाँ नामांकन के बाद जहाँ आम बच्चे अपना भविष्य सुरक्षित मान रहे थे, वहीं मैं अभी भी संतुष्ट नहीं था और लगातार मेहनत कर रहा था ताकि मुझे अच्छा जॉब मिल सके और मैं अपने परिवार को उस मुश्किल परिस्थिति से बाहर निकाल सकूँ। मेरे एक मित्र का ISRO में वैज्ञानिक बनने की बहुत इच्छा थी और उसके संपर्क में रहने और फिर ISRO के बारे में और पढ़ने के बाद मुझे भी अच्छा लगने लगा। मैंने भी ISRO में वैज्ञानिक बनने के लिए तैयारी शुरू कर दिया और 2010 में अपने पहले ही प्रयास में मुझे सफलता मिल गई। मैं अब खुश हूँ कि मैंने अपनी सफलता से पापा-मम्मी ने मेरे लिए जो संघर्ष किया, उस संघर्ष का कुछ हिस्सा उन्हें समाज में मिल रहे सम्मान के रूप में लौटा पाया, साथ ही खुद के साथ-साथ अपने परिवार और देश के लिए भी योगदान कर पा रहा हूँ। और हाँ एक बात बताना भूल गया कि मैंने खुश होकर मेहनत करना बंद नहीं किया है बल्कि ISRO में वैज्ञानिक के रूप में मैं हमेशा बेहतर करने की अभी भी कोशिश करते रहता हूँ क्योंकि मेहनत करना अब आदत सी हो गई है।

अंत में पूर्व राष्ट्रपति माननीय एपीजे अब्दुल कलाम की पंक्ति साझा करना चाहूँगा कि

“अपनी पहली सफलता के बाद विश्राम मत करो,

क्योंकि अगर आप दूसरी बार में असफल हो गए

तो बहुत से होठ यह कहने के इंतजार में होंगे

कि आपकी पहली सफलता केवल एक तुक्का थी”।

 

 

 

(यह कुमार शिवम से “कोसी की आस” टीम के सदस्य के बातचीत पर आधारित है।)

 

“कोसी की आस” टीम परिवार की ओर से “कुमार शिवम” को उनके इस बेहतरीन सफलता के लिए अनंत शुभकामनायें।

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टीम- “कोसी की आस” ..©

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