गोलमा, सहरसा के एक छोटे से घर से ED में असिस्टेंट डाइरेक्टर तक का सफर

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आज “कोसी की आस” आपको एक ऐसे शख़्सियत से मिलवाने जा रही है, जो न सिर्फ प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहे छात्रों के लिए बल्कि सामान्य जीवन में भी सफलता की चाह रखने वाले व्यक्ति के  लिए प्रेरणादायक है। आज जिनकी बात की जा रही है वो हैं गोलमा, सहरसा के सामान्य परिवार से ताल्लुक रखने वाले शैक्षणिक रूप से बहुमुखी प्रतिभा के धनी और पुराने सिक्कों का संग्रह करने के शौकीन श्री निशांत नीरज, पिता:- श्री उमाशंकर सिंह।

कुछ पाने के प्रति श्री नीरज के जिद के बारे में बताना चाहूँगा कि विभिन्न प्रतियोगी परीक्षा में प्रारम्भिक रूप चयन होने के उपरांत सर्वप्रथम उनका अंतिम रूप से चयन सहायक, भारतीय रेल (ग्रुप D) के पद पर हुआ। ये उनका जिद ही था जिसके बल पर वो सहायक, भारतीय रेल (ग्रुप D) के पद से रेलवे में ही पूछताछ सह टिकट संग्राहक (TC) फिर रेलवे में ही ट्रैफिक अप्रेंटिस (TA) और फिर सहायक प्रवर्तन अधिकारी, प्रवर्तन निदेशालय (ED) और फिर वर्तमान में सहायक निदेशक, प्रवर्तन निदेशालय (ED) के पद पर पदस्थ हैं।

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“कोसी की आस” टीम के सदस्य जब उनसे मिलने गए और उनसे उनके अबतक के सफर और कठिनाइयों के बारे में जैसे ही पूछा –

(उनसे बातचीत के अंश उन्हीं के शब्दों में)

वे भावुक हो जाते हैं और फिर बोलते हैं, अरे हाँ, पहले कठिनाइयों की ही बात करते हैं। प्रारम्भिक शिक्षा हेतु शुरुआत में, मेरा नामांकन एक अंग्रेजी माध्यम के कॉन्वेंट स्कूल में हुआ। कक्षा एक तक की पढ़ाई मैंने इस स्कूल से की। मेरी स्मरण शक्ति काफी अच्छी थी पर किसी भी प्रश्न के उत्तर को लिपिबद्ध करने में मुझे काफी परेशानी महसूस होती थी। यद्यपि, उन सभी प्रश्नों के उत्तर मुझे याद रहते थे और पूछे जाने पर, मैं उन्हें धाराप्रवाह बता भी देता था, पर परीक्षा में, मैं अक्सर उनके जवाब बिना लिखे आ जाता था। ख़ैर, कक्षा एक की पढ़ाई के बाद पारिवारिक कारणों से मैं अपने गाँव आ गया। पिताजी को गाँव के सरकारी स्कूल के पढ़ाई पर कोई भरोसा नहीं था। नतीजा, बिना स्कूल गए, घर पर ही पढ़ाई होती रही। फिर एक दिन, अचानक, गाँव के ही सरकारी स्कूल के कक्षा पाँच में, मेरा नामांकन करवा दिया गया। तीन वर्षों तक, अर्थात कक्षा सात तक, मैंने इस स्कूल में पढ़ाई की। उसके बाद, फ़िर से वही बात! गाँव के सरकारी उच्च विद्यालय में पढ़ाई तो होती नहीं थी, इसलिए मैं घर पर रह कर ही पढ़ाई करने लगा। अब अगर आप स्कूल नहीं जायें, तो होमवर्क तो मिलेगा नहीं और आप अपनी आवश्यक्ता के अनुरूप अपनी पढ़ाई की दिनचर्या तय करेंगे। तीन वर्ष के बाद, सीधे कक्षा दस में, मेरा नामांकन हुआ। मैट्रिक (दसवीं) की परीक्षा में मैंने अपने विद्यालय में सबसे ज्यादा अंक प्राप्त किया। यहाँ तक तो कुल मिलाकर सब ठीक-ठाक कहा जा सकता है।

धाराप्रवाह बोलते-बोलते अचानक चुप हो जाते हैं, फिर से टोकने पर अपनी भावना को छुपा नहीं पते और फिर भावुकता के साथ जो बताते हैं, उसके अंश उन्हीं के शब्दों में-

 

अब मैं अपनी आगे की पढ़ाई के लिए शहर में आ गया, यहाँ स्पष्ट कर दूँ कि शहर यानि दिल्ली, मुंबई नहीं बल्कि सहरसा। यहाँ आगे का समय बहुत मुश्किल से बीता। सालों की बंदिशों के बाद पहली बार घर से अकेले बाहर निकलना। खैर, जैसे-तैसे मैंने सहरसा के सरकारी कॉलेज से अपनी इंटरमीडिएट (10+2) और स्नातक की पढ़ाई पूरी की और प्रतियोगिता परीक्षाओं की तैयारी करने लगा। इसी दौरान, मुझे अनगिनत झंझावतों का सामना भी करना पड़ा, मैं उन बातों को बयां नहीं कर पाऊँगा, पर एक अच्छी बात यह हुई कि, मुझे प्रतियोगिता परीक्षाओं की तैयारी कर रहे “रॉयल ग्रुप” के करीब दस ऐसे साथी मिल गए, जिनका साथ हमें न सिर्फ प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए बल्कि कठिनाइयों के साथ आगे बढ्ने में भी मिला। अब आगे के जीवन का एक ही लक्ष्य था, किसी भी तरह से एक सरकारी नौकरी प्राप्त करना।

उनसे जब कुछ सवाल “कोसी की आस” टीम के सदस्य ने पूछा तो उनके जबाब-

  1. किस शिक्षण संस्थान से आपने तैयारी की:- बिना किसी शिक्षण संस्थान के, खुद ही और हाँ, दोस्तों का सहयोग भी।
  2. आपको इसकी तैयारी के लिए प्रेरणा कहाँ से मिली:- जीवन के संघर्ष एवँ विपरीत परिस्थितियों से।
  3. आप इस सफलता का श्रेय किसे देना चाहते हैं:- ईश्वर एवँ खुद के परिश्रम को। साथ ही, मित्रों का अटूट सहयोग।
  4. वर्तमान में प्रयासरत युवाओं के लिए आप क्या संदेश देना चाहेंगे:- आचार्य रामवृक्ष बेनीपुरीजी का कथन कि “जो मनुष्य अपना लक्ष्य जितना ऊपर रखता है, उसका तीर उतना ही ऊपर जाता है”, काफ़ी महत्वपूर्ण है। यह आपको, आपके अपनी क्षमता के मुताबिक, लक्ष्य निर्धारण में काफी मदद करता है। वैसे, मैंने खुद के लिए एक ही मंत्र तय किया था जो आपके लिए भी उपयोगी हो सकता है – “Set the target &  Hit the target”.                                               असंभव शब्द को अपने मन से बाहर कर दें, तो बाकी सभी चीजें क्या, कब, कैसे, होती चली जाती है आपको भी पता नहीं चलेगा। और सबसे महत्वपूर्ण बात, अपने अतीत को याद रखें, यह आपके भविष्य के लिए काफ़ी प्रेरणादायक होगा।
  5. अपनी सफलता की राह में आनेवाली कठिनाई के बारे में बताइये- यूँ तो मैंने पहले ही कठिनाइयों के बारे में आपको बता चुका हूँ। फिर भी बताना चाहूँगा कि कठिनाइयों एवं सफलता, दोनों में अन्योन्याश्रय संबंध होता है। दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू की तरह हैं। मेरे जीवन में भी काफी कठिनाइयाँ आईं, शैक्षिणिक, पारिवारिक एवं आर्थिक। पर अपने दोस्तों एवं खुद के आत्मबल एवं भरोसे के बल पर, उन सभी कठिनाइयों से जूझते हुए  मैं  उन्नति की एक-एक सीढ़ियां चढ़ता चला गया।

 

(यह लेखक के स्वतंत्र विचार हैं।)

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टीम- “कोसी की आस” ..©

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