मधेपुरा :- गोपों के गढ़ में लालू की पार्टी के सफाये का कारण

0
670
- Advertisement -

राजेश कुमार/राजा सहरसा संवाददाता:

 

- Advertisement -

विशेष:- गोपों के गढ़ में दो बड़े दिग्गजों को जोरदार झटका, लालू के साथ आकर भी क्यों नहीं जीत पाए शरद यादव और  बाहुबली पूर्व सांसद पप्पू यादव के हार की ये रही वजहें……

 

पड़ताल:- गोपों के गढ़ मधेपुरा में इस बार गैर-यादव जातियों के वोट ने निर्णायक भूमिका निभाई। गैर यादव जातियों के वोट एनडीए की ओर से जेडीयू प्रत्याशी दिनेशचंद्र यादव को मिलते रहे।

मधेपुरा लोक सभा क्षेत्र से रिपोर्ट:- लोकसभा चुनाव 2019 के नतीजे 23 मई को घोषित हुए, बीजेपी अकेले ही पूर्ण बहुमत से अधिक सीटें (303 सीट) प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बंपर जीत प्राप्त किया। बिहार के मधेपुरा लोक संसदीय सीट जो देश के हाईप्रोफाईल और बेहद हॉट सीट में से एक था, बिहार के मधेपुरा संसदीय सीट से जदयू के दिनेश चंद्र यादव ने देश के सबसे पुराने सांसद, प्रखर समाजवादी नेता शरद यादव व पप्पू यादव को भी पटखनी देकर विजय हासिल की है।

मालूम हो कि मधेपुरा के मतदाता को ढाई दशक से लालू – शरद की राजनैतिक दुश्मनी की आदत सी हो गई थी। जदयू के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद यादव खुद लालू की पार्टी का चुनाव चिन्ह लालटेन लेकर इस बार घूमे लेकिन सफलता हाथ नहीं लगी। बीते चुनावी के दौरान शरद यादव के पक्ष में मधेपुरा में महीना भर डेरा डालने वाले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार उनकी शिकस्त चाहते थे और एक वक्त शरद यादव के सबसे विश्वासपात्र दिनेशचंद्र यादव, जदयू के टिकट पर विरोध में चुनाव लड़े और जोरदार जीत हासिल की है।

गौरतलब है कि बिहार की मधेपुरा लोकसभा सीट हाईप्रोफाइल सीट मानी जाती रही है। गोपों के सर्वमान्य माने जाने वाले आरजेडी चीफ लालू प्रसाद का ये गढ़ रहा है, तो जाप सुप्रीमों पप्पू यादव और शरद यादव के बीच की सियासी जंग में इस बार दोनों को काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, लेकिन इस बार दोनों दिग्गजों को निराशा हाथ लगी।

बताते चलें कि 2008 के परिसीमन के बाद मधेपुरा लोकसभा क्षेत्र में विधानसभा की 6 सीटें यथा – महिषी, सहरसा, सोनवर्षा (सु) , मधेपुरा, बिहारीगंज और आलमनगर सीटें आई। 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में इन 6 सीटों में से 3 पर जेडीयू और 3 पर आरजेडी की जीत हुई थी। बिहार की मधेपुरा लोकसभा सीट इसलिए भी हाईप्रोफाइल सीट मानी जाती है, क्योंकि यह मंडल आयोग के अध्यक्ष रहे बी. पी. मंडल का पैतृक जिला है। आरजेडी चीफ लालू प्रसाद दो बार मधेपुरा सीट से लोकसभा चुनाव जीते, जबकि चार बार शरद यादव यहाँ से जीतने में कामयाब रहे। मधेपुरा से 2014 में पप्पू यादव ने आरजेडी के टिकट पर चुनाव लड़ा था और जीते। 2014 में लालू यादव के बदले स्थानीय बाहुबली नेता पप्पू यादव ने राजद के टिकट पर शरद यादव को हराया। बीजेपी के विजय कुमार सिंह तीसरे नंबर पर रहे थे। 2019 में NDA की ओर से जदयू के दिनेशचंद्र यादव ने जीत हासिल की।

 

मधेपुरा लोकसभा क्षेत्र का चुनावी इतिहास:-

 

⇒ ब्रिटिश हुकूमत के दौरान 1924 में हुए प्रथम बिहार-उड़ीसा विधान परिषद् चुनाव में (तत्कालीन मधेपुरा-सहरसा अर्थात भागलपुर नॉर्थ) से महान स्वंत्रता सेनानी और मुरहो के जमींदार स्व.रासबिहारी लाल मंडल के बड़े सुपुत्र भुवनेश्वरी प्रसाद मंडल विजयी हुए थे।

⇒ 1937 के बिहार विधान परिषद् के चुनाव में स्व.रासबिहारी लाल मंडल के द्वितीय सुपुत्र कमलेश्वरी प्रसाद मंडल निर्वाचित हुए थे।

⇒ स्वतंत्र भारत में 1952 में हुए प्रथम चुनाव में भागलपुर नॉर्थ या भागलपुर -पूर्णियां से तीन उम्मीदवार निर्वाचित हुए। प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के आचार्य जे बी कृपलानी, कांग्रेस के अनूप लाल मेहता और रिजर्व सीट से मुरहो निवासी सोशलिस्ट पार्टी से किराय मुशहर।

⇒ 1957 में इस क्षेत्र का नाम सहरसा हो गया और कांग्रेस के ललित नारायण मिश्र और रिजर्व से कांग्रेस के ही भोला सरदार विजयी रहे।

⇒ 1962 में कांग्रेस के ललित नारायण मिश्र को हरा कर सोशलिस्ट पार्टी के भूपेंद्र नारायण मंडल विजयी रहे। इसी चुनाव में काँग्रेस ने आरोप लगाया था कि भूपेंद्र बाबू जातिगत नारा – ‘रोम पोप का, मधेपुरा गोप का’, देकर जीते। बाद में पटना उच्च न्यायालय ने इस आरोप को आधारहीन माना।

⇒ 1967 से सहरसा और मधेपुरा अलग-अलग क्षेत्र हो गया और रासबिहारी लाल मंडल के सबसे छोटे सुपुत्र, बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री बी पी मंडल मधेपुरा से संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर जीते।

1971में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के राजेंद्र प्रसाद यादव।

1977में जनता पार्टी के बी पी मंडल ।

1980में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के राजेंद्र प्रसाद यादव।

1984 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के महावीर प्रसाद यादव।

1989 में जनता दल के रमेंद्र कुमार यादव ‘रवि’ ।

1991 में जनता दल के शरद यादव।

1996में जनता दल के शरद यादव।

1998 में राष्ट्रीय जनता दल के लालू प्रसाद यादव।

1999में जदयू के शरद यादव।

2004में राष्ट्रीय जनता दल के लालू प्रसाद यादव।

2004 में राष्ट्रीय जनता दल के राजेश रंजन उर्फ़ पप्पू यादव। (राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव के इस्तीफ़ा देने के कारण उप चुनाव हुआ)

2009 में जनता दल (यूनाइटेड) के शरद यादव।

2014 में राष्ट्रीय जनता दल के राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव (हालांकि बाद में पप्पू यादव ने राजद से बगावत कर अपनी अलग जन अधिकार पार्टी बना लिया)

सनद रहे कि 2014 के लोकसभा चुनाव में कुल पड़े 1034799 वोटों में से पप्पू यादव को 368937 वोट मिले थे जबकि शरद यादव को कुल 312728 वोट। विजय कुशवाहा 252534 वोट लाकर तीसरे नंबर पर रहे थे। 2014 में मधेपुरा लोक सभा क्षेत्र में वोटरों की संख्या 1725693 थी। 2014 के चुनाव में कड़ा त्रिकोणात्मक संघर्ष हुआ था, जिसमें मंडल मसीहा के नाम से मशहूर शरद यादव को शिकस्त मिली थी।

बताते चलें कि इस बार बिहार के मधेपुरा लोकसभा संसदीय सीट का चुनाव अपने आप में दिलचस्प रहा। हैरानी की बात ये रही कि लालू की पार्टी में आकर और लालू के गढ़ से चुनाव लड़कर भी शरद यादव जीत हासिल नहीं कर पाए। मधेपुरा सीट पर त्रिकोणीय मुकाबले में जेडीयू प्रत्याशी दिनेश चंद्र यादव से शरद यादव एवं पप्पू यादव को हार का मुंह देखना पड़ा। जनता ने दिनेश चंद्र यादव को दिन रात कड़ी मेहनत करने का सौगात दी है। वहीं पप्पू यादव बिहार की राजनीति के जाने माने चेहरा हैं, किसी समय में बिहार के बाहुबली हुआ करते थे। आरजेडी के टिकट पर पहली बार वो 1991 में चुनाव जीते और 1996, 1999 और 2004 में भी आरजेडी से वो चुनाव जीतने में सफल रहे। लेकिन 2019 में वो अपनी जमानत तक नहीं बचा सके है। पप्पू यादव ने जन अधिकार पार्टी का गठन किया और मधेपुरा से चुनाव लड़ा लेकिन उन्हें महज 97631 वोट मिले। वहीं मधेपुरा से जेडीयू के दिनेश चंद्र यादव ने जीत दर्ज की। आरजेडी के टिकट से मैदान में उतरे शरद यादव को 322807 वोट मिले। पप्पू यादव के लिए यह चुनाव इसलिए भी शॉकिंग रहा क्योंकि उनकी पत्नी रंजीता रंजन भी चुनाव हार गईं। रंजीता रंजन को कांग्रेस ने सुपौल से मैदान में उतारा था, लेकिन जेडीयू के दिलेश्वर कामत ने उन्हें करारी शिकस्त दी। रंजीता रंजन 2014 लोकसभा चुनाव में भी सुपौल से कांग्रेस की उम्मीदवार थीं और जीत भी दर्ज की थी।

 

लालू के गढ़ में क्यों हार गए शरद यादव एवं पप्पू यादव…

 

  • लालू के गढ़ मधेपुरा में इस बार गैर-यादव जातियों के वोट ने निर्णायक भूमिका निभाई, गैर-यादव जातियों के वोट एनडीए की ओर से जेडीयू प्रत्याशी दिनेशचंद्र यादव को मिले हैं। बीजेपी के साथ आने से जेडीयू उम्मीदवार दिनेश चंद्र यादव को सवर्णों के एकजुट वोट मिले, जिसने जीत की राह आसान बनाई।
  • मधेपुरा में सबसे ज्यादा यादव वोटर्स (करीब 5 लाख) हैं। मधेपुरा सीट पर चुनाव लड़ रहे तीनों बड़े चेहरे इस समुदाय से आते हैं। जेडीयू से दिनेश चंद्र यादव, आरजेडी से शरद यादव और जनअधिकार पार्टी की तरफ से पप्पू यादव के बीच यादव वोटबैंक बंट गया, वोटों में बिखराव का फायदा जेडीयू प्रत्याशी को मिला।
  • इस बार के जातीय गणित के मुताबिक, जिस पार्टी ने गैर-यादव और गैर-मुस्लिम वोटों का ध्रुवीकरण कर लिया, उसकी जीत पक्की हुई। आरजेडी के मुस्लिम-यादव वोट बैंक के जवाब में बाकी जातियों का ध्रुवीकरण हुआ और इसका सीधा फायदा जेडीयू उम्मीदवार को मिला।
  • इस सीट पर करीब 18 फीसदी ब्राह्मण और राजपूत वोटर्स के अलावा 23 फीसदी वैश्य और पचपनियां जाति (5 पिछड़ी और अतिपिछड़ी जातियों का समूह) और 22 फीसदी दलित मुसहर, धानुक वोटर्स हैं। इनमें से ज्यादातर जातियों के वोट जेडीयू के दिनेश चंद्र यादव को मिलते रहे हैं।
  • इस सीट के चुनाव पर नीतीश कुमार की खास नजर थी। जेडीयू से अलग होकर शरद यादव ने एक तरह से नीतीश कुमार को चुनौती दी थी। लालू के गढ़ में शरद यादव की हार नीतीश कुमार की व्यक्तिगत जीत की तरह है।
  • इस चुनाव में जनता ने स्थानीय मुद्दों को तवज्जो नहीं दी, ज्यादातर चर्चा पाकिस्तान पर सर्जिकल स्ट्राइक, राष्ट्रवाद और आतंकवाद पर ही रही। इसका फायदा एनडीए को मिला।
  • पीएम के तौर पर नरेंद्र मोदी की मजबूत छवि और विपक्ष के कुनबे में विरोधाभासों की भरमार ने जनता का रुख एनडीए की तरफ रखा।
  • पप्पू यादव की जनअधिकार पार्टी की तरफ से चुनाव में उतरने का फायदा एनडीए प्रत्याशी को ही मिला। एक ओर सुपौल से उनकी पत्नी कांग्रेस उम्मीदवार हैं तो दूसरी तरफ कांग्रेस के समर्थन वाली महागठबंधन उम्मीदवार के खिलाफ वो चुनाव मैदान में थे। जनता ने इस विरोधाभास के विरोध में वोट दिया।
  • मधेपुरा लोकसभा सीट की 6 विधानसभा सीटों में से 3 पर जेडीयू का कब्जा है। इन विधानसभा सीटों पर जेडीयू की मजबूती ने एनडीए प्रत्याशी को फायदा पहुंचाया।
  • मधेपुरा की लड़ाई एक तरह से नीतीश कुमार और शरद यादव की लड़ाई थी। ये नीतीश कुमार के लिए नाक का सवाल बन गया था। इस जीत को नीतीश कुमार, लालू के गढ़ में अंतिम फतह की तरह पेश कर सकते हैं।
  • मधेपुरा में स्थानीय स्तर पर बहुत समस्याएं हैं। किसानों और युवा छात्रों की सबसे दयनीय स्थिति है, लेकिन किसान, रोजगार और महंगाई जैसे मुद्दे चुनाव को प्रभावित नहीं कर पाए।
  • 2014 के चुनाव में बीजेपी के विजय कुमार ने करीब ढाई लाख वोट हासिल किए थे। उस चुनाव में बीजेपी और जेडीयू अलग होकर लड़ी थी। इस बार दोनों को मिलकर लड़ने का फायदा मिला।
  • जेडीयू प्रत्याशी दिनेश चंद्र यादव सहरसा लोकसभा सीट से सांसद रह चुके हैं, शरद यादव के मुकाबले उनके स्थानीय होने का फायदा मिला।
  • इस सीट पर शरद यादव 4 बार जीत हासिल कर चुके हैं, लेकिन हर चुनाव में उनके प्रतिद्वंद्वी उनके बाहरी होने का मुद्दा उठाते हैं, एक तरफ शरद यादव का बाहरी होना, दूसरी तरफ पप्पू यादव की अपेक्षा लोगों ने स्थानीय नेता दिनेश चंद्र यादव को चुनना पसंद किया।
- Advertisement -