पापा का विश्वास और दोस्तों की मदद से “मायानगरी” में सफलता की लकीर खींच रहे पतरघट, सहरसा के विपुल आनंद।

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“ओरे पिता मैं, तोसे बना हूँ,

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बाँह पकड़ तोरे, साथ बढ़ा हूँ,

चाह यही तोरे, सब गम ले लूँ,

सारी खुशी तेरे, चरण सँजो दूँ,

ओरे पिता सब, तो पे लूटा दूँ,

आन मोरे, तोरी शान बढ़ा दूँ”।।

-श्लोका, रैपर

हमारे समाज में आज भी कॅरियर के दृष्टिकोण से परंपरागत पढ़ाई जैसे साइंस (विज्ञान), कॉमर्स (वाणिज्य) और आर्ट्स (कला) पर ही ज़ोर दिया जाता है और इस गहरे लीक से हटकर असीमित संभावनाओं से भरे क्षेत्रों में से किसी एक को अपना मुकाम बनाने वाले युवाओं को इस 21 वीं सदी में भी काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। ख़ास कर ग्रामीण, गरीब और मध्यमवर्गीय परिवार से आने वाले युवाओं को, मानो ऐसा लगता है कि 21 वीं सदी में भी, वो सपने नहीं देख सकते हैं।

लेकिन वो कहते हैं न कि “आपकी सफलता, आपमें अपने सपने पाने के लिए कितनी आग है, उसपे निर्भर करती है”। आज़ कोसी की आस” टीम अपने प्रेरक कहानी शृंखला की साप्ताहिक और 32वीं कड़ी में जिस प्रेरक व्यक्तित्व की कहानी प्रस्तुत करने जा रही है, उनका जीवन-संघर्ष न केवल प्रेरणादायी है बल्कि यह साबित करता है कि ग्रामीण, गरीब और मध्यमवर्गीय परिवार से आने वाले युवा भी सच में, अपने हसीन सपनों को पंख देकर समाज के लिए उदाहरण बन सकते हैं। तो आइये मिलते हैं भगवतपुर, पतरघट, सहरसा के श्री लाल बहादुर यादव और श्रीमती रानी देवी के प्रतिभावान पुत्र विपुल आनंद से।

श्री विपुल आनंद से बातचीत की शुरुआत करने से पहले उनके सफलता और प्रेरणा के आधार पर हम अपने युवा मित्रों से एक पंक्ति साझा करना चाहेंगे कि

“अपने सपनों को जिंदा रखिए, अगर आपके सपनों की चिंगारी बुझ गई है,

तो इसका मतलब है कि आपने जीते जी आत्महत्या कर ली है।”

श्री विपुल आनंद से जब उन्हें अपने बारे में बताने के लिए बोला गया तो उन्होंने जो बताया, आइये सुनते है उन्हीं की जुबानी- “मैं भी सामान्य बच्चों की तरह गाँव के स्कूल (बी॰ एल॰ इंटर स्कूल, मुरलीगंज) से 10वीं और एम॰ एल॰ टी॰ कॉलेज सहरसा से साइंस से 12वीं और बी॰ एन॰ एम॰ यू॰ मधेपुरा से राजनीति विज्ञान से स्नातक किया”। यहाँ तक तो सब ठीक था, असल लड़ाई तो अब होने वाली थी।

अरे-अरे मैं तो बताना ही भूल गया कि मैं भी औरों की तरह इंजीनियरिंग की तैयारी करने पटना गया था। कलिंगा यूनिवर्सिटी में इंजीनियरिंग में हो भी गया था, लेकिन गया नहीं क्योंकि उसी साल मैं बिहार TET भी पास कर गया था, लेकिन शिक्षक के रूप में नियुक्ति में समय था तो मैंने इंगलिश स्पोकन सीखने एक इंस्टिट्यूट में दाखिला लेने गया था। पास में ही एक नाटक का शो करने कुछ लोग आए थे। वह शो देखने के बाद मैंने “आशुतोष अभिज्ञ” (जो सहरसा से ही हैं और पटना में रंगमंच करते हैं) से बात कर उनके साथ प्रेमचंद रंगशाला में एक नाटक में काम करने चला गया। मुझे अच्छा लगा और महसूस हुआ कि यही है जो मुझे करना है मैंने बहुत सोच समझकर पहले इंजीनियरिंग और बाद में शिक्षक की नौकरी छोड़ने का फैसला किया। हमलोग जिस समाज से आते हैं वहाँ इंजीनियरिंग में नामांकन नहीं कराना चल सकता है किन्तु सरकारी नौकरी (शिक्षक) छोड़ने का फैसला वाकई बहुत कठिन था। घर, परिवार, रिश्तेदार और समाज सभी मेरे फैसले को गलत और मुझे ताने देने लगे। समझें तो मुझे, सबने एक तरह से बहिष्कार कर दिया था। मैंने टीचर के पद पर जोइनिंग के काउंसिलिंग में पापा को आखरी बार समझाया और मनाया, बोला पापा मुझे ये काम नहीं करना है, आखिरकार वो मान गए। उन्होंने खुद माँ या किसी को बिना बताये मुझे ₹500/- दिए और खुद ही कॉउंसलिंग से मुझे सहरसा स्टेशन छोड़ने आये। मेरे इस काम को समझने और मुझपर विश्वास करने वाले पहले व्यक्ति पापा थे। पापा का भरोसा आज भी मुझे बहुत प्रेरित करता है। आज वे भी मेरे काम से बहुत संतुष्ट हैं।

Central University of Jharkhand से Theatre Arts में परास्नातक श्री विपुल आनंद आगे बताते हैं कि अक्षरा आर्ट्स, पटना रंगमंडल रंगमंच की शुरुआत से हुई है, के डाइरेक्टर अजीत कुमार के साथ लंबे समय तक रंगमंच किया। इसके अलावा मैं ज्यादा वक्त प्रेमचंद रंगशाला में बीताता था। जहाँ मैं खुद प्रैक्टिस करता था, या कोई नाटक और अभिनय की किताब बढ़ता था। किसी सीनियर के दिख जाने पर, मैं उनको अभिनय करके दिखा कर उनका फीडबैक लेता था। ऐसा करते-करते लगभग 2 साल हो गए थे। फिर मैं दिल्ली चला गया, वहाँ एक मैथिली लोक-रंग नामक संस्था के साथ 2 साल अभिनय का कार्य किया। अंधों की हाथी’ नाटक में एक किरदार अदा करने, मैं पटना आया था। उस नाटक का प्रदर्शन पटना के कालिदास में होना था और उस नाटक को देखने ज़ी पुरबैया चैनल के निर्देशक आये थे, जिन्होंने नाटक के बाद अपने सीरियल में अभिनय के लिए मुझे बुलाया। सीरयल का नाम “बस एक चाँद मेरा भी” , जिसमें हेरोइन के भाई आदित्या का एक लंबा किरदार दिया गया। यह मेरा पहला काम और बड़ा किरदार था, जो लगभग 4-5 महीने तक लगातार सीरियल में आता रहा।

अपनी अब तक की सफलता का श्रेय माँ-पिताजी, बड़े भाई पुरुषोत्तम, मित्र- राहुल, अजीत, चंचल और भी कई अन्य को देने वाले श्री विपुल का Intercultural Theatre Institute Singapore में भी चयन हुआ जो बिहार से अब तक पहला चयन था। श्री विपुल अपने अनुभव बताते हुये कहते हैं कि मुझे लगता है कि सैकड़ों युवा आज़ खुद को समझने और खुद की आवाज़ को दबाते जा रहे हैं। ऐसा नहीं होना चाहिए, आपको जिस कार्य में रुचि है या जिसको आप अच्छे से जी सकते हो, वही करना चाहिए और उसके लिए ही घरवालों को मानना भी चाहिए। साथ ही एक महत्वपूर्ण बात, अगर बाद आपको कोई बेहतर समझता है तो वह है आपका परिवार, इसलिए गलती से भी परिवार से मनमुटाव न करें, अगर वो किसी कार्य के लिए आपको रोकते हैं इसका ये अर्थ बिल्कुल नहीं की वो आपसे सहमत नहीं हैं बल्कि उनका डर, उनके नजरिए से आपके सुरक्षित भविष्य को लेकर हो सकता है। हम जब अपनी पसंद का कार्य करते हैं तो उस कार्य में मेहनताने का साथ हमें खुशियाँ भी मिलती है, अर्थात यदि कार्य पसंद का न हो तो, पैसे तो मिलते हैं किन्तु हमारी खुशियाँ छीन जाती है, हम चिरचिरे हो जाते हैं।

इसलिए अपने मुकाम तय करने से पहले शांति और समझदारी के साथ खुद का एनालिसिस करें कि हम क्या कर रहे हैं? और हमें क्या करना है? साथ ही अभिभावकों से भी हमारा विनम्र निवेदन है कि अपने बच्चे को वर्तमान परिवेश के अनुसार समझने का प्रयास करें और वह जिस किसी भी क्षेत्र में आगे बढ़ना चाहता है, उसमें मदद करें क्योंकि आपकी जरूरत उन्हें सबसे ज्यादा है।

“संघर्ष इंसान को मजबूत बनाता है,

फिर चाहे वो कितना भी कमजोर क्यों न हो”।

इसलिए अपने बच्चे के भविष्य को लेकर डरें नहीं, संघर्ष आपके बच्चे को मजबूत बनाएगा, हाँ, यह सच है कि जरूरी नहीं कि हर बच्चा अमिताभ बच्चन बन जाए, लेकिन उनसे कई गुना पीछे रहने वाले अभिनेता-अभिनेत्री का जीवन भी एक मध्यमवर्गीय परिवार के जीवन से बेहतर होता है। यह सब आपके बच्चे पर निर्भर करता है, इसलिए उनको समझें और समझायें तथा हौसला और मौका दें। मुम्बई आने वाले युवाओं के लिए मैं इतना कहूँगा कि अगर आपको अपने अभिनय पर विश्वास है और थोड़े बहुत पैसे कमाने का हुनर जानते हैं या फिर घर से आर्थिक मदद मिल सकती है तो निश्चिंत होकर आयें। आपको काम मिलेगा, देर से ही सही मिलेगा ज़रूर।

जब श्री विपुल आनंद से उनकी सफलता की राह में आनेवाली कठिनाई के बारे में हमने पूछा तो उन्होंने बताया कि रंगमंच करते हुए ज्यादा कठिनाई का सामना नहीं करना पड़ा। पैसों को लेकर कठिनाई आती थी क्योंकि पापा के पास इतने पैसे नहीं थे कि घर, भाई और मेरा दिल्ली में रहने का खर्च उठा सकें। कुछ महीने तो मेरे मित्र अजीत कुमार (जो कैमिस्ट्री पॉइंट सहरसा के संचालक हैं) ने मेरा सारा खर्च उठाया। लेकिन 3-4 महीने बाद मुझे लगा कि अजीत मेरे ही उम्र का है और अगर वो मेरा भी खर्च उठा सकता है, तो मैं भी खुद का खर्च उठाऊंगा। मैं 8th, 9th और 10th के बच्चों को दिल्ली में होम ट्यूशन देने लगा। अब मेरे पास इतने पैसे हो जाते थे कि मैं खुद का खर्च उठा सकूँ और रंगमंच भी कर लूँ। जब मैंने खुद का खर्च उठाया तो मैं पहले की तुलना में ज्यादा कॉन्फिडेंट हो गया।

उसके बाद मुम्बई, यहाँ हम जैसे लोगों को मूलतः दो कठिनाईयों का सामना करना होता है, एक तो काम कैसे मिलेगा और दूसरा रहने-खाने का। इस दोनो को बैलेंस बहुत सावधानी से करना पड़ता है। अक्टूबर 2017 में जब मुम्बई आया तो सबकुछ नया था मेरे लिए, सबकुछ खुद ही पता करना था कि फ़िल्म इंडस्ट्री का काम कहाँ और कैसे होता है? वहाँ क्या बोलना है? किससे मिलना है? जैसे कई सवाल थे जिसको समझने और समाधान निकालने में 3-4 महीने निकल गए। रोज सुबह तैयार होकर ऑडिशन के लिए जाना और रोज रिजेक्ट होकर घर वापस लौट जाना। वह बहुत नीरस, उबाऊ और मुश्किल पल था, कई बार हमें गेट से ही भगा दिया जाता था। इसी बीच एक बार, एक वेब सीरीज की कास्टिंग में पहली बार मुझे ऑडिशन के लिए बुलाया गया था। देखा तो कई लोग ऑडिशन दे रहे थे, मैं सबको देख कर यही सोच रहा था कि इन सब मे डाइरेक्टर मुझे क्यों चुनेगा? तो जबाब आया सिर्फ अच्छी अभिनय के कारण। मैं नर्वस हो रहा था। मैं स्क्रिप्ट लेकर एक कोने में बैठ गया और खुद के फोन में अपना ऑडिशन रिकॉर्ड कर देखता रहा और उसमें सुधार करता रहा। जब मैं विश्वस्त हो गया कि अब ठीक है, तो ऑडिशन लाइन में जाकर ऑडिशन दिया। आखिरकार मुझे वो वेब सीरीज मिल गयी। फाइनल होने के बाद मुझे पता चला कि वो वेब सीरीज अमेज़ॉन प्राइम की है मिनिस्ट्री’ नाम से आएगी और उसमें इरफान खान मुख्य भूमिका में होंगे। उसके बाद मुझमें कॉन्फिडेंस आ गया, अब काम भी मिल रहे लेकिन मैं अभी भी मुम्बई में खुद को सफल नहीं मानता हूँ, मुझे अब भी काम की कमी है। खाली वक़्त में किताबें पढ़ना, फिल्म देखना और घर में ही अभिनय कर दोस्तों को दिखाता हूँ। अभिनय के अलावा मैं आर्थिक समस्याओं के निदान के लिए पर्दे के पीछे का काम जैसे किसी फिल्म में अपनी आवाज़ देने, सहायक निर्देशक का काम, कॉस्ट्यूम डिज़ाइन का काम करता हूँ। मैं परिवार के साथ-साथ अपने दोस्तों का शुक्रगुज़ार हूँ कि वो हमेशा मेरी मदद के लिए तैयार रहते हैं। खासकर राहुल सिंह और चंचल जैसे दोस्त। इन दोनो ने जैसे मुझे मुंबई में मुझे रोक कर रखा है। मेरे परिवार के लोग भी अब बहुत सपोर्ट करते हैं, आप पर आपके घर वालों का विश्वास होना बहुत ज़रूरी होता है क्योंकि दुनिया कितनी भी अच्छी या बुरी हो, आपको आपके परिवार का विश्वास एक अलग ऊर्जा देती है।

मैं अभी अपनी फिल्म तान्डवम् की बात करूं तो यह फ़िल्म मेरी एक दोस्त और कमाल की अभिनेत्री सोनल त्रिवेदी’ की वजह से मिली। वह कई सीरिअल्स में लीड रोल कर चुकी हैं। सोनल ने ही मुझे निर्देशक “कुंदन कुणाल” से मिलवाया।

श्री विपुल आनंद के द्वारा किए गए अब तक के महत्वपूर्ण किरदार-

◆ वर्तमान में Hindi Feature Film- “Tandavam” में Raayo Bhakirta and Rajpal Yadav (निर्देशक- Kundan Kunal) के साथ एक अहम किरदार कर रहा हूँ।

◆Web series “Ministry” For Amazon Prime

◆ Add Film For Bajaj Maxima

◆ Documentary Film- Naachi-se-Banchi

◆ Tv Serial बस एक चाँद मेरा भी’ for Zee Purbaiya

◆Tv Serial बलचनमा” D.D. Kisan

◆Tv Serial पुलिस फाइल्स” Big Magic

◆ सात वर्षों से लगातार रंगमंच मैकबेथ, कोर्ट मार्शल जैसे दर्जनों नाटकों में अभिनय।

 

कोसी की आस परिवार अपने सभी पाठकों से कहना चाहती है कि साधन का रोना रोने, परिवार और समाज का दबाब जैसे अन्य समस्याओं को गिनते रहने से समाधान नहीं होता, अगर सच में हम समाधान चाहते हैं, तो उसके लिए पैसा, पावर और सहयोग से ज्यादा उस लक्ष्य को पाने के लिए आपके जज़्बे, मेहनत, दृढ़निश्चय और आपके व्यवहार पर निर्भर करता है।

अंत में आप सभी के लिए एक पंक्ति साझा करना चाहूँगा कि

“आकाश की तरफ देखिये, हम अकेले नहीं हैं,

सारा ब्रह्मांड हमारे लिए अनुकूल है और,

जो सपने देखते हैं और मेहनत करते हैं,

उन्हें प्रतिफल देने की साज़िश भगवान करते हैं।”

 

 (यह विपुल आनंद से “कोसी की आस” टीम के सदस्य के बातचीत पर आधारित है।)

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टीम- “कोसी की आस” ..©

 

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