बुक-बाईंडिंग (जिल्दसाजी) करने से लेकर सीबीआई मुख्यालय तक की यात्रा

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आज “कोसी की आस” टीम आपको दो ऐसे भाइयों से मिलवाने जा रही है, जो न सिर्फ प्रतियोगी परीक्षा में सफलता की चाह रखने वाले प्रत्येक छात्र के लिए बल्कि व्यावहारिक जीवन में भी सफलता की चाह रखने वालों के लिए प्रेरक है। ये बातचीत उन सभी छात्रों के लिए विशेष रूप से है, जो आर्थिक रूप से विपरीत परिस्थिति होने के बाबजूद अपने-अपने लक्ष्य की ओर पूरी दृढ़ता से प्रयासरत हैं। “कोसी की आस” टीम जिन दो-भाइयों को आज आपसे रूबरू करवाने जा रही है, वे हैं वार्ड न.-13, नया नगर, सुपौल, बिहार के बहुमुखी प्रतिभा के धनी श्री विजय नारायण दास के सुपुत्र श्री चंदन कुमार चाँद और श्री गौतम कुमार अंशु।

  1. शिक्षा:-

 

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श्री चंदन कुमार चाँद श्री गौतम कुमार अंशु
10 वीं विलियम्स उच्च विद्यालय, सुपौल, वर्ष-1998, प्रथम श्रेणी विलियम्स उच्च विद्यालय, सुपौल, वर्ष-1999, प्रथम श्रेणी
12 वीं बी एस एस कॉलेज, सुपौल, वर्ष-2000, द्वितीय श्रेणी (विज्ञान) बी एस एस कॉलेज, सुपौल, वर्ष-2001, प्रथम श्रेणी (विज्ञान)
स्नातक बी एस एस कॉलेज, सुपौल, वर्ष-2005, प्रथम श्रेणी (रसायन शास्त्र,प्रतिष्ठा),

बी एन एम यू मधेपुरा

बी एस एस कॉलेज, सुपौल, वर्ष-2006, प्रथम श्रेणी (गणित,प्रतिष्ठा),

बी एन एम यू मधेपुरा

विधि स्नातक आर एम एम विधि महाविद्यालय, वर्ष-2009, प्रथम श्रेणी, बी एन एम यू मधेपुरा ———–

 

  1. पूर्व में चयन:-
श्री चंदन कुमार चाँद श्री गौतम कुमार अंशु
लेखापाल, भारतीय लेखा एवं लेखा परीक्षा विभाग, रायपुर, छत्तीसगढ़ (SSC, CGL-2008) निरीक्षक, केंद्रीय अन्वेषन ब्यूरो, गुवाहटी (SSC, CGL-2008) वर्तमान कार्यरत
क्लर्क, भारतीय स्टेट बैंक क्लर्क, भारतीय स्टेट बैंक
निरीक्षक, केंद्रीय अन्वेषन ब्यूरो, कोलकाता (SSC, CGL-2010, SLD0019) वर्तमान कार्यरत सहायक, सशस्त्र बल मुख्यालय (SSC,CGL-2010, SLD0016)
———- अनुभाग अधिकारी (SSC, CGDA)

  1. अभिरुचि:- अध्ययन – अध्यापन।

 

  1. किस शिक्षण संस्थान से आप दोनों ने प्रतियोगिता परीक्षा की तैयारी की:- स्व-अध्ययन।

 

  1. आप लोगों को प्रतियोगी परीक्षा के लिए प्रेरणा कहाँ से मिला:- आर्थिक विपन्नता के बाबजूद, माता-पिता ने सदैव आगे बढ़ने को प्रेरित किया।

 

 

  1. आप दोनों इस सफलता का श्रेय किसे देना चाहते हैं:- दोनों भाई एक साथ बोल पड़ते हैं कि माता-पिता और बड़ी बहन का आशीर्वाद और त्याग तथा ईश्वर की असीम अनुकंपा।

 

  1. वर्तमान में प्रयासरत युवाओं के लिए आप दोनों क्या संदेश देना चाहेंगे :- चाहे जैसी भी परिस्थितियाँ हो हिम्मत न हारें । इरादे अटल होने चाहिए। एक ही बार में सब-कुछ पा जाने की अभिलाषा न रखें। क्रमबद्ध तरीके से तैयारी करें। कम पढ़ें, किन्तु अच्छे से पढ़ें। नियमित रूप से अध्ययन करें। छोटे-छोटे लक्ष्य बनाकर अध्ययन करें। अनुभवी लोगों के अनुभव का  उपयोग करें । जो गलतियाँ वरिष्ठ कर चुके हैं, उनसे सीख लेनी चाहिए, न कि उन्हें दुहराकर सीखें। वर्तमान परिस्थिति के लिए – टेक्नोसेवी तो बने पर, अतिनिर्भर न हों और समय का सदुपयोग करें न कि उसे मोबाइल और इंटरनेट पर नष्ट करें।

 

 

इन सवालों के जबाब मिलने के उपरांत “कोसी की आस” टीम के सदस्य ने जब दोनों भाइयों से उनके इस पथ में आई कठिनाइयों के बारे में पूछा तो कुछ पल के लिए दोनों भावुक हो जाते हैं और फिर कहते हैं कि समझ में नहीं आता कि क्या बोलूँ:- जहाँ एक मन कहता उन मुश्किल पल को याद न करूँ फिर दूसरे तरह से देखें तो उसी मुश्किल ने हमलोगों को लड़ना सिखाया और आज जो भी हूँ, शायद उसी मुश्किल की वजह से।

 

जब भी हमलोग परेशान होते दुष्यंत कुमार की पंक्तियाँ हमेशा फिर से प्रयास करने को प्रेरित करता –

 

“कौन कहता कि आसमाँ में सुराख़ नहीं हो सकता,

एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो”

 

शिक्षा –दीक्षा और सफलता के मार्ग में आई बाधायेँ:-

  1. पिताजी सरकारी सेवा मे कार्यरत थे, लेकिन 1992 से ही वेतनबंदी के बाद कर्ज़ का बोझ बढ़ता चला गया। समय पर शुल्क दिये बगैर निजी विद्यालय मे पढ़ाई कब तक संभव थी? किसी तरह कर्ज़ के बल पर और शाख के दम पर छठी कक्षा तक की पढ़ाई पुरानी किताबों के भरोसे, जो दूसरों से आधे दाम पर लिए जाते थे “भारत मॉडर्न अकैडमी’ से हुई। तत्पश्चात विलियम्स उच्च विद्यालय मे नामांकन कराया गया। यहाँ भी किताबों की समस्या तो थी ही। फिर हमलोगों ने जिल्दसाजी (book Binding) को अपने धनार्जन को स्रोत बनाया। विभिन्न संस्थाओं में और दुकान –दुकान घूम कर जिल्दसाजी का काम लेते थे और घर पर ही विद्यालय के बाद बचे समय में कार्य पूर्ण कर वापस कर देते थे। कुछ समय बाद अपने से कनिष्ठ छात्रों को पढाना शुरू किया। 10 वीं तक तो बहुत ही कम शुल्क नाम मात्र (20/-प्रति मास, प्रति छात्र 1998 ) में पढ़ाते रहे। इधर कर्ज़ का बोझ भी बढ़ता जा रहा था। एक वक्त ऐसा भी था कि सगे-संबंधी आर्थिक मदद तो नहीं करते लेकिन टीका-टिप्पणी में कोई कमी नहीं करते।  उस मुश्किल वक्त में एक मामाजी श्री अजय कुमार वर्मा (निदेशक, सोना विद्या विहार) ने यथासंभव पढ़ाई में मदद किया।
  2. याद आता है वो समय भी जब 1996 मे विद्यालय में ड्रेस कोड की शुरुआत हुई थी। एक दिन उचित ड्रेस न होने कि वजह से तत्कालीन प्रधानाचार्य “मोहम्मद साबिर साहब” ने विद्यालय से निकाल दिया था। फिर बहुत निवेदन और परिस्थितियाँ बताने पर उन्होंने  जैसे-तैसे बिना ड्रेस कोड के विद्यालय आने की अनुमति दी। एक समय ऐसा भी  था जब मैट्रिक (10 वीं) का फॉर्म  भरने के लिए भी आवश्यक पैसे की व्यवस्था नहीं हो पा रही थी। कर्ज़ के बल पर ही ये संभव हो पाया।
  3. तीनों भाई-बहन की पढ़ाई का खर्च एक साथ उठा पाना मुश्किल हो रहा था, तो बड़ी बहन ने त्याग किया लेकिन हमेशा दोनों भाइयों को आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। हालांकि बाद में उन्होंने भी शीर्षता हासिल करते हुए स्नातक की डिग्री ली।
  4. 10 वीं के बाद अध्यापन को पूर्ण रूप से व्यवसाय ही बना लिया ताकि कर्ज़ और न बढ़े। कुछ लोग ऐसे मिले जिन्हें मजबूरी का फायदा उठाना आता था और ऐसे लोगों ने उठाया भी। न्यूनतम शुल्क पर ही अध्यापन कार्य चलता रहा। इसी समय पाठ्य सामग्री का एक छोटा सा दुकान भी खोला, ताकि कॉलेज से बचे समय में कुछ अतिरिक्त धनार्जन हो सके। अधिकतर समय धनार्जन हेतु व्यवसाय संचालन और अध्यापन में निकल जाता था। पर दोनों भाई इसके विकल्प के रूप में देर रात तक अध्ययन करते थे। कठोर परिश्रम और दृढ़ लगन से नियमित अध्ययन करते रहे।
  5. सटीक मार्गदर्शन का अभाव भी एक बड़ी बाधा थी क्योंकि कोई ये बताने वाला नहीं था कि क्या पढ़ा जाए और क्या नहीं? पुस्तकें भी आसानी से उपलब्ध नहीं थी। विकल्प ये निकाला गया कि पिछले वर्ष के प्रश्न पत्रों का गहन अध्ययन किया जाए और उसके अनुरूप तैयारी की जाए।
  6. उस वक्त लोगों में एक आम-धारणा यह थी कि बगैर पैसा (रिश्वत) दिये सिर्फ प्रतिभा के बल पर सरकारी नौकरी हासिल नहीं हो सकती। हम दोनों ने कभी ऐसे नकारात्मक विचारों को अपने पास फटकने तक नहीं दिया। बस ये धुन थी कि “यदि एक भी वाजिब सीट है तो वो हमारे लिए है”

उनकी धुन (जिद्द) की कहानी सुनते-सुनते भारतरत्न और पूर्व प्रधानमंत्री अटल जी की पंक्तियाँ याद आती है:-

 

“हार नहीं मानूँगा,

रार नहीं ठनूँगा,

काल के कपाल से,

लिखता-मिटाता हूँ,

गीत नया गाता हूँ”…….

 

 

और जब दोनों भाइयों ने कर्मचारी चयन आयोग की परीक्षाएँ उच्च स्थान के साथ उतीर्ण किया तो, लोगों और तैयारी करने वाले अन्य प्रतिभागियों को भी लगा कि, वो भी बिना रिश्वत दिये नौकरी प्राप्त कर सकते हैं।

 

सामाजिक उपलब्धि:-

  1. गरीबी के चलते शिक्षा के मार्ग में स्वयं को हुए समस्याओं को देखते हुए, अपनी पढ़ाई के साथ-साथ अन्य को भी प्रेरित करते रहे। कई गरीब बच्चों को निशुल्क पढ़ाना जारी रखा। कई निरक्षर बच्चों को साक्षर बनाया। आज उनमें से कई अच्छी जगहों पर पदस्थापित हैं। कई अत्यंत गरीब बच्चे, आज विभिन्न व्यवसाय में लगे हुए हैं और मिलने पर खुले दिल से ये स्वीकारते हैं कि आज उनकी जीविका उसी शिक्षा की  देन है जो उन्हें चन्दन भैया और गौतम भैया ने दी।
  2. आज “वही”, (यहाँ वही का मतलब आप समझ सकते हैं) समाज और स्थानीय जन पुरे परिवार को उचित सम्मान और आदर प्रदान करते हैं। युवा वर्ग उन्हें प्रेरणा स्त्रोत के रूप मे देखते हैं। कई बच्चे  चन्दन भैया और गौतम भैया जैसा बनना चाहते हैं। बुजुर्ग अपने बच्चों को चन्दन और गौतम का उदाहरण देकर वैसा ही बनने को प्रेरित करते हैं।

 

 

 

 

इस सच्ची कहानी के माध्यम से “कोसी की आस टीम” अपने सभी पाठक को कहना चाहता है कि चाहे कैसी भी परिस्थिति हो, हिम्मत न हारें और प्रतेक असफलता के बाद दोगुनी मेहनत के साथ फिर से प्रयास करें, हम दावे के साथ कहते हैं आप बेशक अपने क्षेत्र में सफल होंगे और एक दिन आपकी सफलता की कहानी के लिए हमारी टीम आपसे संपर्क करेगी।

 

इन दोनों भाइयों के सफलता को देख महान कवि रामधारी सिंह दिनकर जी की कथाकाव्य रचना “रश्मीरथी” की पंक्तियाँ याद आती है कि:-

“तेजस्वी सम्मान खोजते नहीं गोत्र बतलाके,

पाते हैं जग से प्रशस्ति अपना करतब दिखलाके।

हीन मूल की ओर देख जग गलत कहे या ठीक,

वीर खींचकर ही रहते हैं इतिहासों में लीक।।”

 

 

(यह श्री चंदन कुमार चाँद और श्री गौतम कुमार अंशु से “कोसी की आस” टीम के सदस्य के बातचीत पर आधारित है।)

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टीम- “कोसी की आस” ..©

 

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