दो दिन

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कुमुद रंजन झा “अनुन्जया”
कोसी की आस@सुपौल

सुनो,
तुम अक्सर कहते थे ना?
“कुमुद” तुम सामान्य नहीं हो!
तुम औरों से अलग हो,
कुछ विशेष हो।
समथिंग पायष!
कुछ तो खास है “तुम” मे,
जो ना चाहते हुए भी!
विकर्षण के भाव मे भी!
विपरीत ध्रुवों कि,
धारणा के बावजूद भी,
आकर्षित होता जा रहा हूँ!

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सुनो,
मैं सबसे अलग हूँ, या थी!
विशेष हूँ या थी !
आई डोन्ट नो!!
बट!!!!!
तुमसे मिलने के बाद सामान्य नहीं हूँ,
यह तो तय है ना?

सब त्योहारों की तैयारी मे तल्लीन हैं,
और मैं! तुम्हारी,
ब्लूटिक! अपडेट्स!
स्टेटस तलाशने मै लीन हूँ!
पिछले कितने सालों से,
आई डोन्ट रिमेम्बर!!
आई होप यू रिमेम्बर???

सुनो,
ये बाहर के फटाकों की आवाजें भी,
मुझे सुनाई नहीं देती,
प्रेम मे उरान्तर का कोलाहल,
इतना प्रबल होता है कि,
बाहर का सारा शोर शून्य !सादृश्य!

अब मिठाइयों की खुशबू
कहाँ ललचाती हैं?
मुझ चटोरी को!
एक कड़वा सा स्वाद दे गए हो,
जीवन जिह्वा पर!

सुनो,
तुम देख पा रहे हो ना ?
तड़प के तीर को चूमती,
दिवाली के दुधिया रौशनी के लड़ियों को,
हालांकि मेरी रुचि!
इन लड़ियों मे नहीं है!
ना थी और ना रहेगी!!
मेरी रूचि तो,
उन घड़ियों को गिनने मे है,
जो तुम्हारी “दो दिन”की
प्रतीक्षा के प्रत्येक पल मे गुजरते हैं।
टिक… धक…टिक…धक.. टिक…धक
हैप्पी दिवाली

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