गढ़ बरुआरी, सुपौल के एक छोटे से दुकान से इंस्पेक्टर ऑफ सेंट्रल टैक्स एंड सेंट्रल एक्साइज बनने की कहानी उन्हीं की जुबानी

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आज “कोसी की आस” आपको एक ऐसे व्यक्तित्व से मिलवाने जा रही है, जो प्रतियोगी परीक्षा में सफलता की चाह रखने वाले प्रत्येक छात्र के लिए प्रेरणादायक है। ये बातचीत उन सभी छात्रों के लिए विशेष रूप से जो आर्थिक रूप से विपरीत परिस्थिति होने के बाबजूद अपने-अपने लक्ष्य की ओर पूरी दृढ़ता से प्रयासरत हैं। “कोसी की आस” टीम जिनके बारे में बात करने जा रही है वो हैं सुपौल के गढ़ बरुआरी गाँव के बहुमुखी प्रतिभा के धनी श्री नन्द किशोर सिंह और श्रीमती सुजाता सिंह के सुपुत्र श्री अभिजीत कुमार (गुड्डू)।

व्यक्तिगत परिचय

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नाम:- श्री अभिजीत कुमार (गुड्डू)

पिता/ माता का नाम:- श्री नन्द किशोर सिंह और श्रीमती सुजाता सिंह

शिक्षा:-             10वीं-  विश्वनाथ उच्च विद्यालय, रकिया

12वीं-  (I.Sc.) M L T कॉलेज सहरसा

स्नातक- (B.Com.) R M  कॉलेज सहरसा

  1. पूर्व में चयन:- – बिहार शिक्षक, बैंक क्लर्क, बैंक पी ओ, कर्मचारी चयन आयोग 3 बार जिसमें 2 बार एक्साइज इंस्पेक्टर।
  2. वर्तमान पद:- इंस्पेक्टर ऑफ सेंट्रल टैक्स एंड सेंट्रल एक्साइज।
  3. अभिरुचि:- : पढ़ाना।
  4. किस शिक्षण संस्थान से आपने तैयारी की:- इच्छा तो काफी थी शिक्षण संस्थान से तैयारी करने की, किन्तु परिस्थिती ऐसी बनी कि चाहते हुये भी मैं किसी शिक्षण संस्थान से तैयारी नहीं कर पाया। मैंने जो भी सफलता अबतक पाई, सब खुद से पढ़ाई का परिणाम है।
  5. आपको इसकी तैयारी के लिए प्रेरणा कहाँ से मिला:- जब मैं सहरसा आया और अपने आस-पास “यमुना निवास” में “रॉयल ग्रुप” के भैया लोगों को प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करते देखा और उस वक्त मैंने जब गणित आदि विषय के सवाल देखे तो मुझे काफी आसान लगा क्योंकि मम्मी-पापा की वजह से हम तीनों भाई-बहन का 10वीं तक का सारे विषय काफी अच्छे थे। अत: जहाँ तक प्रेरणा की बात है तो वो “रॉयल ग्रुप” के भैया लोगों से मिली।
  6. आप इस सफलता का श्रेय किसे देना चाहते हैं:- मम्मी-पापा, दीदी, “रॉयल ग्रुप” के भैया लोगों के साथ-साथ कुछ अजीज दोस्तों को।
  7. वर्तमान में प्रयासरत युवाओं के लिए आप क्या संदेश देना चाहेंगे:- दूसरों की बातों में बिल्कुल न आयें, अपनी क्षमता को पहचान अपना लक्ष्य तय करें, 10वीं और 12वीं तक अपना बेसिक ठीक करें, ढ़ेर सारे किताब का जमघट लगाने के बजाय उतना ही किताब लें जीतने को अच्छी तरह से पढ़ सकें और इस प्रण के साथ प्रयास करें कि

“आप हर वो चीज कर सकते हैं जो आप इच्छा रखते हैं”

एक ख़ास बात जो उन्होंने अपने बातचीत मैं बताया कि जरूरी नहीं कि 10 से 12 घंटे पढ़ा जाए बल्कि प्रतिबद्ध होकर 2 से 3 घंटे नियमित रूप से पढ़ा जाए तो सफलता आपके कदम चूमेगी। सहसा ही वे महान कवि श्री हरिवंश राय बच्चन की पंक्तियाँ गुनगुनाने लगे:-

लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती,

कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

नन्हीं चींटी जब दाना लेकर चलती है,

चढ़ती दीवारों पर, सौ बार फिसलती है।

मन का विश्वास रगों में साहस भरता है,

चढ़कर गिरना, गिरकर चढ़ना न अखरता है।

आख़िर उसकी मेहनत बेकार नहीं होती,

कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

 

8.अपनी सफलता की राह में आनेवाली कठिनाई के बारे में बताएं:-

श्री अभिजीत, अपने बचपन के दिन को याद करते हुये बताते हैं कि यूँ तो जिन कठिनाइयों को हमसभी सदस्यों नें झेला उसे 2-4 शब्दों में बयां करना बेमानी होगी, फिर भी मोटे तौर पर जो बाते हैं वो बताना चाहूँगा कि 5 सदस्यों (पापा, मम्मी, दीदी, मैं और छोटा भाई) का परिवार, एक छोटे से दुकान पर निर्भर था, किन्तु पापा-मम्मी का पढ़ाई से लगाव और अपने जीवन में विभिन्न कारणों की वजह सफल नहीं होने के कारण, वैसे हालात में भी वो हम तीनों को पढ़ाना चाहते थे और कहीं-न-कहीं वो अपने सपने हम तीनों में देखने लगे थे (“कोसी की आस” टीम यहाँ उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि की बात इसलिए कर रही है कि हमारे ही बीच के कई छात्र अपने आर्थिकस्थिति को कारण बता अपने ज़िम्मेदारी से भागते दिखते हैं।)। प्राथमिक शिक्षा गाँव के सरकारी विद्यालय से हुआ और पापा–मम्मी की वजह से हमलोगों को पढ़ाई में किसी और से मदद नहीं लेनी पड़ी। दसवीं (10th) तक की पढ़ाई पास के गाँव के विश्वनाथ उच्च विद्यालय, रकिया से हुई, यहाँ तक तो सब ठीक-ठाक था। हमारे और हमारे परिवार के लिए असल में अब परीक्षा की घड़ी थी, पापा-मम्मी पढ़ाना तो चाहते थे किन्तु उनके लिए पटना, दिल्ली को तो छोड़िए एक छोटे से जिला मुख्यालय सहरसा से भी बारहवीं (10+2) करवाना काफी मुश्किल था। फिर भी हम बारहवीं (10+2) के लिए सहरसा आ गए, M L T कॉलेज सहरसा में नामांकन हुआ, कॉलेज में नियमित कक्षा नहीं होती थी और कोचिंग के लिए पैसे नहीं थे। आखिरकार खुद से विज्ञान विषय पढ़कर बारहवीं (10+2) की तैयारी की और हाँ कभी-कभी जीवन में परीक्षा कुछ ज्यादा ही हो जाती है। मैं बिहार बोर्ड से था और दीदी के कहने पर अँग्रेजी माध्यम ले लिया जो मेरे लिए और मुश्किल हो गया था लेकिन दीदी ने परीक्षा से एक सप्ताह पहले पढ़ाया और भगवान का शुक्र था मैं प्रथम श्रेणी से पास हो गया।

वो चर्चित कहावत एक बार फिर से चरितार्थ हुई कि….

“अगर किसी चीज को दिल से चाहो…तो,

पूरी कायनात उसे तुमसे मिलाने की कोशिश में लग जाती है”

उस दौर को याद कर काफी भावुक होते हुये श्री अभिजीत बताते हैं, पता नहीं क्यों लेकिन हर एक कदम पर मेरे जीवन का इम्तिहान भगवान उस वक्त ले रहे थे जैसे- मेरे सभी कागजात का खो जाना आदि। किन्तु एक सबसे खूबसूरत बात थी कि पापा-मम्मी का साथ हमेशा की तरह मिल रहा था। पापा-मम्मी हम तीनों भाई-बहन को हर अच्छे जगह भेज पढ़ाना तो चाहते थे किन्तु पैसा बीच में रोड़ा बन जाता था। आखिरकार हम लोगों ने पटना जाने का फैसला किया और जाने से पहले हमने संपर्क कर होम-ट्यूशन और कोचिंग में पढ़ाने के लिए बात कर लिया था ताकि हमलोग अपना खर्च निकाल सकें। 10वीं तक का गणित और विज्ञान विषय अच्छा होने के कारण पटना में हमलोगों का होम-ट्यूशन और कोचिंग में माँग बढ़ गया और वहाँ होने वाले खर्च का मसला हल हो गया। मैंने अपने मजबूरी को अपने मजबूती के रूप में लिया, मैं पटना में पढ़ने और रहने के लिए जो होम-ट्यूशन और कोचिंग में पढ़ाने का कार्य किया उसका मेरी सफलता में अहम किरदार रहा। एक बार फिर से किंकर्त्व्यविमूढ़ था कि स्नातक में कौन सा विषय रखा जाय, काफी सोचविचार आखिरकार कॉमर्स विषय से स्नातक में नामांकन करवा लिया। 10+2 विज्ञान विषय से करने के बाद कॉमर्स विषय से स्नातक का प्रथम वर्ष काफी मुश्किल रहा, कक्षा में नहीं समझ पाने की वजह से छात्र-छात्राएँ मज़ाक उड़ाया करते, मैं पीछे की कतार मैं बैठना शुरू कर दिया जो मेरे फितरत में नहीं था। किन्तु फिर मैंने “I can do everything” को मंत्र बनाया और कॉमर्स पढ़ने लगा, कॉमर्स स्नातक के द्वितीय वर्ष में मैं अपने कक्षा में ही जब तक शिक्षक नहीं आते तो पढ़ाने लगा। और-तो-और कॉमर्स स्नातक के तृतीय वर्ष आते-आते मेरे ही कक्षा के बच्चे Income-Tax शिक्षक के बजाय मेरे से पढ़ना चाहते थे। उसी दौरान लाइब्रेरी जाना प्रारंभ किया। वहाँ लड़के-लड़कियों को पागलों की तरह पढ़ते देख दंग रह गया। वहाँ अपने बारे में जिससे भी सलाह लिया सब बोलते CA के लिए प्रयास करो, सरकारी नौकरी के लिए तैयारी करोगे तो फिर हमलोगों को देख लो। वही घिसी-पिटी बात की भगवान को पाना आसान है लेकिन सरकारी नौकरी !…… लेकिन फिर “रॉयल ग्रुप” के भैया लोगों के परीक्षा परिणाम से लगा कोई मुश्किल नहीं। स्नातक के बीच में ही बिहार TET का परीक्षा दिया, यकीन नहीं होगा उस परीक्षा के लिए मैं खासतौर पर एक दिन भी नहीं पढ़ा और परीक्षा परिणाम ने मेरी सोच बदलकर रख दी, काफी अच्छे नंबर से मैं पास हुआ। इस परीक्षा परिणाम से मैं इतना आश्वस्त हो गया कि सरकारी नौकरी इतना भी मुश्किल नहीं जितना तथाकथित छात्र बताते हैं। उसके बाद तो एक समय ऐसा भी आया जब मैं भी पूरा दिन लाइब्रेरी में रहता और पढ़ता कम लेकिन पढ़ाता ज्यादा था, इस वजह से भी मुझे कभी अवधारणा (concepts) को लेकर कभी समस्या नहीं हुई।

मैं और लगन के साथ मेहनत करने लगा तथा भगवान से प्रार्थना करने लगा कि “हे भगवान कैसे भी करके मेरी नियुक्ति शिक्षक के पद पर न हो”। काफी अजीब लग रहा होगा, लेकिन ये सच है क्योंकि मैं गाँव के प्राथमिक या माध्यमिक विद्यालय से आगे की दुनिया देखने लगा था।

लेकिन वो कहावत है न कि “भगवान देते हैं तो छप्पर फाड़ के तो मैं उसमें थोड़ा और जोड़ रहा हूँ कि वो परीक्षा भी छप्पर फाड़ के लेते है”। नियुक्ति का पत्र आ गया। पापा की इच्छा थी कि मैं जॉइन करूँ किन्तु मेरी इच्छा नहीं थी। मैंने पहली बार भगवान सामान पापा से ऊँची आवाज में बात की जिसके लिए मैं कितना भी माफ़ी माँगू कम है क्योंकि वो अपने बीते अनुभव से हमे सलाह दे रहे थे। मैंने जॉइन कर लिया और फिर अवकाश लेकर लगन के साथ मेहनत करने लगा। फिर तो परीक्षा परिणाम, जॉइन करना, छोड़ना और नए जगह जॉइन करना लगा रहा।……………

 

 

(यह श्री अभिजीत कुमार (गुड्डू) से “कोसी की आस” टीम के सदस्य के बातचीत पर आधारित है।)

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टीम- “कोसी की आस” ..©

 

 

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