गर्मियों की सर्द रातें!

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कुमुद”अनुन्जया”
कोसी की आस @ सुपौल

सर्दियाँ शुरू हुई नहीं कि
याद आने लगती हैं,
गर्मियों की खुली आसमान की राते,
पंखा! बीनी! सुराही! घड़े की रातें।

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सहसा आवाजें आती हैं,
रे मार मार ….
लाठी लाओ…..
टार्च लाओ…….
सांप है…. सांप है…..
सुनो ठीक से मारना।।
बचने ना पाए ……
आंख जरुर थकुचना….
नहीं तो नागिन बदला लेगी!!
सुनो ईट के नीचे दबा दो!
अरे नहीं जला दो….

और इस शोर से हीं सृजित हो जाते हैं सहस्त्र प्रश्न!

क्या सभी सर्पों के सर कुचल दिए गए?
क्या मनुष्यों का दंभ सिर्फ़ निमुह निःशक्त के लिए है?
क्या जान से मारना काफी नहीं था?
मनुष्य की महानता मुंह थकुचने मे हीं है क्या?

चलो माना विषैला था!
तुम्हारे अस्तित्व के लिए,
उसका अस्तित्व मिटाना जरूरी था!!

बेचारी को स्वजनों से क्यों दूर किया?
क्या कुटुंब को अंतिम दर्शन का भी अधिकार नहीं था?
क्या पुरूषार्थ, प्रमाणिक हो गया?

प्रश्नों के प्रहार शीत कर जाते हैं,
गर्मियों की रातों को!
ओह् !!!!
ये गर्मियों की शीत! सर्द!ठंडी रातें!!!

#उत्पीड़न #माबलिंचिग #घरेलुहिंसा #आनरकिलिंग

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