क्यों करूँ मैं अराधना किसी देव की?

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क्यों करूँ मैं अराधना किसी देव की?

क्यों करूँ मैं अराधना किसी देव की?
जबकि तुम प्राण प्रतिष्ठित हो,
मेरे उर आलय में।

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कान्हा सा कनक प्रेम तुम्हारा,
शिव शंभु सा सनातन सानिध्य है।

क्यों करूँ मै अराधना किसी देव की?

गुरू बृहस्पति सा गौरव गरिमा तुम्हारा,
पुरूषोत्तम राम सा अपरिमेय प्रेम है।

क्यों करुं मै अराधना किसी देव की?

सूर्य सा शाश्वत प्रचंड तेज तुम्हारा,
शशि सा शीतल सुधा सिक्त स्पर्श है।

क्यों करू मे अराधना किसी देव की?

कामदेव सा मादक आकर्षण तुम्हारा,
विहुंस विरह विष पीने वाले,
तुम्हीं तो मेरे नीलकंठ हो।

उपर्युक्त पंक्तियाँ भेलाही, सुपौल की कुमुद “अनुन्जया”, जो भारत सरकार के केंद्रीय विद्यालय की दिल्ली शाखा में कार्यरत हैं ने आये दिन समाज में हो रहे घटनाओं के संबंध में लिखा है।

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