सुपौल : महापर्व छठ के अवसर पर विभिन्न घाटों पर उमड़ा जन-सैलाब।

0
208
- Advertisement -

एन के शुशील
कोसी की आस@छातापुर,सुपौल।

जिले के छातापुर प्रखण्ड मुख्यालय समेत विभिन्न पंचायतों में आज सुबह का अर्ध्य प्रदान कर लोगों ने सुख समृद्वि की कामना किया। रविवार की सुबह उगते हुए भगवान सूर्य को अर्ध्य देकर उनकी अराधना करने के साथ ही लगातार चार दिन से चले आ रहा छठ व्रत शांतिपूर्ण माहौल में संपन्न हुआ।छठ व्रती अपने घर एवं परिवार जनों के सुख समृद्धि के लिए घंटों पानी में इंतजार कर भगवान भास्कर को ध्यान किया। छठ पूजा को लेकर व्रतियों और उनके परिजनों में उत्साह का महौल व्याप्त था।

- Advertisement -

छठ पर्व की महिमा अपरंपार है इसकी जानकारी देते हुए पुजारी राज किशोर गोस्वामी ने बताया कि छठ पूजा की चर्चा पौराणिक कथाओं में भी किया गया है कि पूजा में सूर्य देव और छठी मैया की पूजा विधि विधान से की जाती है। छठ पूजा का प्रारंभ कब से हुआ, सूर्य की आराधना कब से प्रारंभ हुई, इसके बारे में पौराणिक कथाओं में बताया गया है। सतयुग में भगवान श्रीराम, द्वापर में दानवीर कर्ण और पांच पांडवों की पत्नी द्रौपदी ने सूर्य की उपासना की थी। छठी मैया की पूजा से जुड़ी एक क​था राजा प्रियवंद की है, जिन्होंने सबसे पहले छठी मैया की पूजा की थी।

आइए जानते हैं कि सूर्य उपासना और छठ पूजा का इतिहास और कथाएं क्या हैं?
राजा प्रियवंद ने पुत्र के प्राण रक्षा के लिए छठ पूजा की थी,
एक पौराणिक कथा के अनुसार, राजा प्रियवंद नि:संतान थे, उनको इसकी पीड़ा थी। उन्होंने महर्षि कश्यप से इसके बारे में बात की। तब महर्षि कश्यप ने संतान प्राप्ति के लिए पुत्रेष्टि यज्ञ कराया। उस दौरान यज्ञ में आहुति के लिए बनाई गई खीर राजा प्रियवंद की पत्नी मालिनी को खाने के लिए दी गई। यज्ञ के खीर के सेवन से रानी मालिनी ने एक पुत्र को जन्म दिया, लेकिन वह मृत पैदा हुआ था। राजा प्रियवंद मृत पुत्र के शव को लेकर शमशान पहुंचे और पुत्र वियोग में अपना प्राण त्यागने लगे।
उसी वक्त ब्रह्मा की मानस पुत्री देवसेना प्रकट हुईं। उन्होंने राजा प्रियवंद से कहा, मैं सृष्टि की मूल प्रवृत्ति के छठे अंश से उत्पन्न हुई हूँ, इसलिए मेरा नाम षष्ठी भी है। तुम मेरी पूजा करो और लोगों में इसका प्रचार-प्रसार करो। माता षष्ठी के कहे अनुसार, राजा प्रियवंद ने पुत्र की कामना से माता का व्रत विधि विधान से किया, उस दिन कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी थी। इसके फलस्वरुप राजा प्रियवद को पुत्र प्राप्त हुआ। इसलिए उस दिन से यह पर्व मनाया जाने लगा।

- Advertisement -