तेरा सिनूर

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स्पेशल डेस्क
कोसी की आस@नई दिल्ली।

मोरा मन मयूर है नाच रहा,
जबसे, मांग सजा तेरा सिनूर।

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अल्हड़ पवन के झोंके सी,
इत उत उड़ती इठलाती थी,

हुई धीर गंभीर जैसे हूँ कोई
शरद की शीतल समीर।
जबसे मांग सजा तेरा सिनूर।

बरसाती नदियों सी
कभी निःनीर तो कभी
उफनता विप्लव!

हुई शांत सदानीरा सरिता,
निर्बाध बहाती अमृतधार,
जबसे मांग सजा तेरा सिनूर।

चंचल चपला तड़ित दामिनी,
कोरी काया मन विहारिनी!

हुई धारिणी संस्कारों कि,
नारी नींव हुई परिवारों कि
जबसे मांग सजा तेरा सिनूर।

उक्त पंक्तियाँ भेलाही “सुपौल” की श्रीमती कुमुद “अनुन्जया” जो केंद्रीय विद्यालय में शिक्षक के पद पर कार्यरत हैं, के द्वारा कोसी की आस टीम को भेजी गई है।

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