आखिर क्यों मनाया जाता है आज अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस?

0
717
- Advertisement -
आज के दिन चारों और खूब चर्चा होती है कि आज “अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस है”। 8 मार्च को हम लोग बड़ी
ताम-झाम से अलग-अलग तरीके से इसे मनाते हैं परंतु शायद हम भूल जाते हैं कि आखिर क्या वजह रही होगी कि हमें इस दिन को मनाना पड़ा। महिलाओं के सम्मान के लिए महज़ 1 दिन। उनके सम्मान के लिए इस दिन को याद करने की आख़िर क्या वजह रही होगी? हम भूल जाते हैं यह वहीं महिलाएं हैं, जिनका सम्मान तो वैदिक काल से होते आ रहा है, फिर हम पूरे  वर्ष यानि 365 या 366 दिन में सिर्फ 1 दिन ही इनके लिए क्यों देते हैं? महिला शब्द का जिक्र होते ही सबसे पहले “नारी” शब्द आता है।
“नारी” यह कोई सामान्य शब्द नहीं है, यह एक ऐसा शब्द है जिसे वैदिक काल से देवत्व प्राप्त है। नारियों  की तुलना वैदिक काल से ही देवी-देवता और भगवान से की जाती रही है। जब भी घर में बेटी का जन्म होता है तो कहा जाता है घर में लक्ष्मी आई है या फिर जब बहू आती है तो उसकी तुलना भी लक्ष्मी के आगमन के रूप में की जाती है। क्या कभी हमनें सुना है कि बेटे के जन्म पर कोई कहे कि कुबेर आए हैं या भगवान विष्णु का जन्म हुआ है। अतः महिलाएं वैदिक काल से ही सम्मान की हकदार रही हैं। हम खूब सुनते हैं कि
“यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता”
अर्थात जहाँ नारी की पूजा होती है, वहीं देवता निवास करते हैं। शायद ही आज कोई होगा जो इसका अर्थ नहीं जानता होगा। लेकिन जब उनसे ये पूछा जाय कि क्या नारी को वो सम्मान मिला है! जिसकी वो हकदार थी, किसी के  पास जबाब नहीं है। शायद हमारा समाज उस नारी को वो सम्मान देने में भूल गया जो उन्हें जन्म-जन्मांतर से प्राप्त था।
हमेशा से ही नारियों को कमजोर माना जाता है, उन्हें अबला के रूप में देखा जाता है, जबकि जो समाज भगवान की पूजा करता है वहाँ भी माँ सरस्वती जिसे विद्या की देवी कहा जाता है, माँ दुर्गा जिसने असुरों के नाश के लिए जन्म लिया है, नारी का स्थान है, फिर उसे अबला क्यों समझती है? ऐसे में जरूरत है महिलाओं को अपनी शक्ति समझने की और एक साथ खड़े होकर स्वयं को सम्मान दिलाने की जो वास्तव में नारी के लिए बना है। बहुत ही दुख की बात है कि आज हमारे देश में “बेटी बचाओ” जैसा अभियान चल रहा है। समाज के नियमों ने समाज में कन्या के स्थान को कमजोर कर दिया है, जिसे बदलने की जरूरत है।
हमलोग आइये जानते हैं कि आखिर महिला दिवस मनाने की शरूआत कब, कैसे और क्यों हुई?
दरअसल “अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस” एक मज़दूर आंदोलन से जुड़ा है। इसकी शुरुआत साल 1908 में हुआ था जब 15 हज़ार औरतों ने न्यूयॉर्क शहर में मार्च निकालकर नौकरी घंटों को कम करने की मांग की थी। साथ ही  उनकी मांग थी कि उन्हें बेहतर वेतन दिया जाए और मतदान करने का अधिकार भी दिया जाए। एक साल बाद सोशलिस्ट पार्टी ऑफ़ अमरीका ने इस दिन को पहला ‘राष्ट्रीय महिला दिवस’ घोषित कर दिया। ये विचार भी एक औरत का ही था। “क्लारा ज़ेटकिन” ने 1910 में कोपेनहेगन में कामकाजी औरतों की एक इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस के दौरान “अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस” मनाने का सुझाव दिया। उस वक़्त कॉन्फ़्रेंस में 17 देशों की 100 औरतें मौजूद थीं। उन सभी ने इस सुझाव का समर्थन किया।
सबसे पहले साल 1911 में ऑस्ट्रिया, डेनमार्क, जर्मनी और स्विट्ज़रलैंड में “अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस” मनाया गया था। दरअसल, क्लारा ज़ेटकिन ने महिला दिवस मनाने के लिए कोई तारीख़ पक्की नहीं की थी।  1917 में युद्ध के दौरान रूस की महिलाओं ने ‘ब्रेड एंड पीस’ (अर्थात रोटी और शांति) की मांग की। महिलाओं की हड़ताल ने वहाँ के सम्राट निकोलस को पद छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया और अंतरिम सरकार ने महिलाओं को मतदान का अधिकार दे दिया।  उस समय रूस में जूलियन कैलेंडर का प्रयोग होता था। जिस दिन महिलाओं ने यह हड़ताल शुरू की थी वो तारीख़ 23 फरवरी थी। ग्रेगेरियन कैलेंडर में यह दिन 8 मार्च था और उसी के बाद से “अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस” 8 मार्च को मनाया जाने लगा।  सन 1975 में महिला दिवस को आधिकारिक मान्यता उस वक्त दी गई थी जब संयुक्त राष्ट्र ने इसे वार्षिक तौर पर एक थीम के साथ मनाना शुरू किया।  “अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस” की पहली थीम ‘सेलीब्रेटिंग द पास्ट, प्लानिंग फ़ॉर द फ्यूचर’ था। इस वर्ष “अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस” का थीम है “बैलेंस फॉर बैटर यानी बेहतर के लिए संतुलन”।
गत वर्षों में महिलाओं  ने प्रगति की है, इसमें कोई संदेह नहीं है। परिस्थितियां बदल रही हैं, हमारे देश में आज महिलाएं आर्मी, एयर फोर्स, पुलिस, आईटी, इंजीनियरिंग, चिकित्सा जैसे क्षेत्र में पुरूषों के साथ कंधे-से-कंधा मिला कर चल रही हैं। माता-पिता अब बेटे-बेटियों में कोई फर्क नहीं समझते हैं। लेकिन यह सोच समाज के कुछ ही वर्ग तक सीमित है। हमें यह सोच समाज में हर वर्ग तक पहुचाना पड़ेगा तभी हम महिलाओं का  खोया  हुआ सम्मान दिला पाएंगे।
आज हमारे देश में महिलाओं को शिक्षा, वोट देने का अधिकार और मौलिक अधिकार आदि प्राप्त है। सही मायने में महिला दिवस तब ही सार्थक होगा जब विश्व भर में महिलाओं को मानसिक व शारीरिक रूप से संपूर्ण आजादी मिलेगी, जहाँ उन्हें कोई प्रताड़ित नहीं करेगा, जहाँ उन्हें दहेज के लालच में जिंदा नहीं जलाया जाएगा, जहाँ कन्या भ्रूण हत्या नहीं की जाएगी, जहाँ बलात्कार नहीं किया जाएगा, जहाँ उसे बेचा नहीं जाएगा। समाज के हर उस महत्वपूर्ण फैसलों में उनको हासिये पर ना रखा जाये, उनकी नजरिये को भी महत्वपूर्ण समझा जाएगा। तात्पर्य यह है कि उन्हें भी पुरूष के समान एक इंसान समझा जाएगा।जहाँ वह सिर उठा कर अपने महिला होने पर गर्व करे , न कि पश्चाताप, कि काश मैं एक लड़का होती।
Pic Source-Internet and YWCA
निवेदन- अगर यह लेख पसंद आई हो तो फ़ेसबूक पर कोसी की आस का पेज https://www.facebook.com/koshikiawajj/  लाइक करना न भूलें, हमारा प्रयास हमेशा की तरह आप तक बेहतरीन और उपयोगी सूचना प्रस्तुत करने का है और रहेगा।
टीम- “कोसी की आस” ..©
- Advertisement -