कोरोना संकट के पीछे का वास्तविक सच।

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स्पेशल डेस्क
कोशी की आस@पटना

आज विश्व के लगभग 190 देश कोरोना महामारी से जूझ रहे हैं। पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था तबाह हो चुकी है। लाखों लोग इस बीमारी के चपेट में हैं और मौत से संघर्ष कर रहे हैं।अधिकारिक तौर पर 28 हजार के करीब लोग अपनी जान गंवा चुके हैं। लाॅक-डाउन के कारण इंसानी जिंदगी थम सी गई है। करोड़ों लोग बेहाल है। इन सब के पीछे अब इंसानी लालच एवं षड्यंत्र की खबर आ रही है, जिसका चीन से सम्बन्ध है।

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ज्ञातव्य हो कि कोरोना संकट की शुरुआत चीन के वुहान शहर से हुई। जहाँ विषाणु से संबंधित शोध संस्थान है।विशेषज्ञों का कहना है कि कोरोना विषाणु के फैलने की रफ्तार से पता चलता है कि यह एक मानव निर्मित कहर है।अभी हाल के खुलासे में यह सामने आया है कि चीन द्वारा निर्मित यह विषाणु जैविक हथियार के रूप में प्रयोग हेतु तैयार किया गया। जिसे अमेरिकी गुप्तचर एजेंसी के हाथों बेचने की तैयारी चल रही थी। लेकिन चीन द्वारा भारी रकम की मांग के चलते अमेरिकी एजेंसी इसे चोरी-छिपे खरीदने का प्रयास किया। जिसकी सूचना चीनी सरकार को लग गई और दोनों देशों के खुफिया एजेंसियों के संघर्ष में यह विषाणु वुहान में एक जगह थोरी मात्रा में लीक हो गई। जिसे चीनी सरकार दबाने का प्रयास किया परिणामस्वरूप आज पूरा विश्व जीवन और मौत के खौफ में जी रहा है।

इस चीनी वाइरस ने पूरी दुनियां को गर्त में धकेल दिया है।विशेषज्ञों का मानना है कि इसके पीछे चीन की बहुत बड़ी आर्थिक साजिश है। आज जहाँ विश्व के देश तबाह हैं, वहीं चीन लगभग सामान्य हो चुका है और पूरे विश्व को इस बीमारी से लड़ने के लिए आवश्यक उपकरण व सामग्री मुहैया करवा रहा है। आज पूरी दुनियां इस बीमारी से उबरने के लिए चीन की तरफ देख रहा है। अमेरिका जैसा महाशक्ति उसके सामने घुटने टेक चुका है। कल तक अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप इस बीमारी को चाइनीज वाइरस कहकर बुलाते थे। वो भी अब चीनी सरकार से मदद के लिए आगे आने को कह रहे हैं। ऐसा नहीं है कि इस षड़यंत्र से लोग वाकिफ नहीं हैं बल्कि सभी की प्राथमिकता अभी पहले इससे उबरने की है।

भारत जैसे सघन जनसंख्या वाले देश के बारे में सोच कर ही डर लगता है, जहाँ अशिक्षित लोगों की झुंड परिस्थिति की गंभीरता को समझे बिना लाॅक-डाउन का सही से प्रतिपालन नहीं कर रहे हैं तथा अफवाहों का आसानी से शिकार हो रहे हैं। ऐसे लोग खुद के साथ देश के अन्य लोगों की जिंदगी भी खतरे में डाल रहे हैं।

यह सच है कि विज्ञान में विकास के साथ विनाश की भी उतनी ही संभावना रहती है। चीन एवं अमेरिका जैसे देशों की आर्थिक लालसा कहीं ऐसा न हो एक दिन भस्मासुर साबित हो। विश्व को इस संकट से उबरने में अभी काफी समय लगेगा। भारत को अपनी अर्थनीति पर विचार करना होगा। आज हम तकनीकी तौर पर काफी पिछड़े हैं। इस संकट ने हमारी पोल खोल दी है। एक मास्क तक के लिए हम चीन पर निर्भर हैं। हम अपने डॉक्टर तक को जरूरी सामान उपलब्ध कराने में विफल साबित हो रहें हैं। हम अपने विज्ञान एवं शोध को विश्वस्तरीय बनाकर ही ऐसी भयानक संकट से उबरने का साहस जुटा पाएंगे। विश्व में अब अप्रत्यक्ष युद्ध लड़ा जाने लगा है जिसमें जैविक हथियारों का प्रयोग बढ़ने की संभावना प्रबल है। दूसरी तरफ आर्थिक अराजकता एवं आंतरिक विद्रोह को बढ़ावा देकर किसी भी देश को अस्थिर करने की साजिश भी बढ़ेगी। हाल में सीएए के नाम पर उपद्रव उसी का एक छोटा उदाहरण था।

उपरोक्त लेख कोशी की आस टीम को भारत सरकार के रेल मंत्रालय में कार्यरत प्रतापगंज, सुपौल के “विजेंद्र जी” ने भेजा है।
(यह लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं)

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