कब है शीतलाअष्टमी, और क्या है ईस पर्व का महत्व….. आइये जानते हैं

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भारत पर्वों/त्योहारों का देश माना जाता है और यहाँ शायद ही कोई पखवाड़ा, महीना हो जिसमें कोई पर्व न मनाया जा रहा हो। जी हां हम बात कर रहें हैं “शीतला अष्टमी” की। यह पर्व चैत्र मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मनाई जाती है। इस साल 16 मार्च यानी सोमवार को शीतलाष्टमी या ‘बसौड़ा’ मनाया जा रहा है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन माता शीतला की पूजा अर्चना से व्यक्ति के जीवन से सभी प्रकार की बाधाएं दूर हो जाती है और जो व्रत कतरे हैं उनके जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का आगमन होता है। यह पर्व उत्तर भारत में इसे बड़े ही हर्षोउल्लास के साथ मनाया जाता है।

मां शीतला गधे पर विराजती हैं और उनके एक हाथ में कलश तो दूसरे हाथ में झाड़ू है। ग्रंथों के अनुसार ऐसा माना जाता है कि मां जिस कलश को पकड़ी हैं, उसमें 33 करोड़ देवी-देवता विराजते हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि इस पर्व को चैत्र माह की कृष्ण पक्ष की सप्तमी के दिन से ही पूजा अर्चना की जाती है और रात को ही माता को प्रसाद के लिए भोजन पकाया जाता है। अष्टमी के दिन उन्हें बासी भोजन का भोग लगाया जाता है। इस दिन खाना नहीं बनता है, बल्कि माता को चढ़ाए गए प्रसाद को ही ग्रहण किया जाता है।

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इस दिन व्रती ब्रह्म मुहूर्त में उठकर घर की साफ़-सफाई, नहा-धोकर व्रत संकल्प लें और फिर माता शीतला की पूजा अर्चना करें और उन्हें बासी भोजन , फल, फूल और मिष्ठान का भोग लगाएं। मां शीतला रोग और कष्टों से मुक्ति दिलाती है। ऐसी मान्यता है कि जो व्यक्ति मां की पूजा विधि विधान पूर्वक करता है, उसे समस्त प्रकार के रोगों एवं कष्टों से मुक्ति मिलती है।

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