बिना तय लक्ष्य के रक्षा मंत्रालय में पहुँचने का सफ़र

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“कोसी की आस” टीम अपने सभी पाठकों को शुक्रिया अदा करती है और उनको बताना चाहती है कि बेहद कम समय में हमलोगों ने आपके सहयोग से जो सफलता पाई है, उसे साझा करने में काफी खुशी हो रही है। हमने जो प्रेरक कहानी शृंखला द्वारा एक प्रयास प्रारंभ किया उसे पढ़ने वाले और उसे अपनी जीवन में उतारने वाले में न सिर्फ कोसी के युवा बल्कि समूचे भारत के युवा शामिल हो गए हैं। यह वक़्त “कोसी की आस” टीम के लिए ख़ुश होने के बजाय अपनी ज़िम्मेदारी को और बेहतर ढंग से निभाने की है। हमारा प्रयास हमेशा सुधार का रहा है और रहेगा। अभी कुछ कमियाँ हैं और कुछ हमारे नियमित पाठक द्वारा उन कमियों पर ध्यान दिलाया जाता है, समूची टीम तहे दिल से उनका शुक्रिया अदा करती है और भविष्य में उसको अमल में लाने का प्रयास करेगी। और वो कहते हैं न कि……

 

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कुछ आरम्भ करने के लिए आपका महान होना आवश्यक नही.. लेकिन महान होने के लिए आपका कुछ आरम्भ करना अत्यंत आवश्यक है”। 

 

यूँ तो सैकड़ों संदेश भारत के विभिन्न राज्यों से मिल रहे हैं, उसी में से एक सीकर, राजस्थान के पाठक ने अपनी कहानी साझा की जो मुझे लगा कि आप-सब से साझा की जाए।

 

यह कहानी उन सभी छात्रों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है, जिनको पता ही नहीं होता हमें करना क्या है? जिन्हें पता ही नहीं होता कि आख़िर वो कर क्या रहे हैं? जिन्हें अपने क़ाबिलियत का अंदाजा ही नहीं है बल्कि भीड़ का हिस्सा बने फिरते हैं और अपना तथा अपने परिवार के लिए सहारा बनने के बजाय बोझ बन जाते हैं।

 

आज “कोसी की आस” टीम अपने प्रेरक कहानी शृंखला की 11वीं कड़ी में सीकर, राजस्थान के ऐसे ही युवा की कहानी बताने जा रही है, जिनका कोई लक्ष्य निश्चित नहीं था, वो भी आम छात्रों के भीड़ में 10वीं, 12वीं, इंजीनियरिंग आदि करते जा रहे थे किन्तु एक दिन की घटना ने उन्हें बदलकर रख दिया और एक जिद के साथ अपने नवीन निर्धारित लक्ष्य में न सिर्फ जुड़े बल्कि उसे पाकर एक बार फिर से “जब जागो, तभी सवेरा”  को चरितार्थ किया।

 

आज हम जिनकी बात करने जा रहे हैं, उनकी कहानी कुछ इसी तरह की है, तो आइये जानते हैं काफी समय बाद अपनी मंजिल तय करने तथा उसे पाने वाले रानोली, सीकर, राजस्थान के श्री बिहारीलाल पारमुवाल और श्रीमती मंजू देवी पारमुवाल  के परिश्रमी और प्रतिभावान सुपुत्र श्री गोमेश पारमुवाल से।

 

 व्यक्तिगत परिचय

 

नाम         :-       श्री गोमेश पारमुवाल

माता         :-      श्रीमती मंजू देवी पारमुवाल

पिता         :-     श्री बिहारीलाल पारमुवाल

 

  1. शिक्षा-      

      10वीं   :-     विद्या निकेतन सीनियर सेकेंडरी स्कूल, रानोली, सीकर, राजस्थान।

                12वीं   :-     टैगोर सीनियर सेकेंडरी स्कूल सीकर, राजस्थान।

             स्‍नातक :-     सोभसरिया इंजीनियरिंग कॉलेज सीकर, राजस्थान।

           परास्‍नातक :-    राजकीय अभियांत्रिकी कॉलेज अजमेर, राजस्थान।

  1. ग्राम +पोस्‍ट :          बैद की ढ़ानी, रानोली, सीकर
  2. जिला :-         सीकर, राजस्थान।
  3. पूर्व में चयन   :-         प्रीवेंटिव ऑफिसर चयनित 2015
  4. वर्तमान पद :-        सहायक अनुभाग अधिकारी (CSS),  रक्षा मंत्रालय, साउथ ब्लॉक, नई दिल्‍ली।
  5. अभिरूचि :-        शतरंज, बागवानी, ट्रैकिंग और क्लासिकल म्यूजिक सुनना।
  6. किस शिक्षण संस्‍थान से आपने तैयारी की:- पारामाउंट कोचिंग का नोट्स एवं स्व-अध्ययन।
  7. आपकोप्रतियोगी परीक्षा की तैयारी की प्रेरणा कहाँ से मिली:- विदेश मंत्रालय में कार्यरत मेरे बहनोई (बहन के पति) श्रीकांत कुमावत से जब मैं पहली बार मिला और उनकी पूर्व की पारिवारिक स्थिति, वर्तमान में उनकी स्थिति और कार्य के बारे में जाना तथा अपने ग्रामीण परिवेश की दयनीय स्थिति को देखकर मुझे लगा कि क्यों ना मैं केंद्र सरकार के मंत्रालय से जुड़, देश के निर्माण में अपनी भी कुछ भागीदारी निभाऊँ।
  8. आप इस सफलता का श्रेय किसे देना चाहते हैं:-मेरी सफलता का पूरा श्रेय मैं अपने पिताजी को देना चाहूँगा, जिन्होंने मुझे हमेशा आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। साथ ही “हर विपरीत परिस्थिति में भी हार ना मान कर अनवरत प्रयास करने के लिए” हौसला अफजाई करते रहते थे।
  9. वर्तमान में प्रयासरत युवाओं के लिए आप क्‍या संदेश देना चाहते हैं:- वर्तमान में प्रतियोगी परीक्षा के लिए प्रयासरत युवाओं के लिए हरिवंश राय बच्चन की कविता की पंक्तियां दुहराना चाहूँगा कि

 

“असफलता एक चुनौती है, स्वीकार करो,
क्या कमी रह गई, देखो और सुधार करो,
जब तक न सफल हो, नींद चैन को त्यागो तुम,
संघर्ष का मैदान छोड़ मत भागो तुम,
कुछ किये बिना ही जय जय कार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती”।

 

  1. अपनी सफलता की राह में आनेवाली कठिनाई के बारे में बताएं :

बहुत ही शालीनता के साथ श्री गोमेश कहते हैं कि मैं 10वीं, 12वीं और इंजीनियरिंग बस करता जा रहा था, लेकिन मुझे कोई सही मार्गदर्शन नहीं मिल पा रहा था, अधिकांश इंजीनियरिंग के छात्र की तरह मुझे पता ही नहीं कि आख़िर मैं कर क्या रहा हूँ? आगे करना क्या है? लेकिन अपने बहनोई से बस एक मुलाक़ात ने मुझ जैसे लक्ष्यहीन छात्र को एक लक्ष्य दिया और मैं पूरी तन्मयता से उसे पाने में जुट गया। परिणाम आप सबके सामने है।

मैंने अपने कॅरियर के चयन और उसके तैयारी में जो मुश्किल देखा, मैं सोचता था कि मेरे गाँव भाई-बहन को वो नहीं देखना पड़े, इसके लिए मैंने अपने गाँव के प्रतिभागियों को अपने नौकरी के साथ-साथ मार्गदर्शन देने का कार्य किया। उसमें से अधिकांश विभिन्न विभागों में अपनी सेवाएं दे रहे हैं, उदाहरणस्वरूप अनिल कुमावत दिल्ली पुलिस सब इंस्पेक्टर, मुकेश कुमावत कनिष्ठ अभियंता, विनोद कुमार कुमावत ऑडिटर (सीएजी) प्रमुख हैं। अंत में मैं अपने सभी प्रतिभागी दोस्तों से बस इतना कहना चाहूँगा कि अपने लक्ष्य को निर्धारित करें और अपना शत-प्रतिशत उसी लक्ष्य को भेदने में लगा दे, मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि सफलता आपके कदम चूमेंगी।

“भागते रहो अपने लक्ष्य के पीछे,

क्योंकि आज नहीं तो और कभी,

करेंगे लोग गौर कभी,

लगे रहो बस रुकना मत,

आयेगा तुम्हारा दौर कभी”।

 

 

 

(यह “श्री गोमेश पारमुवाल” से “कोसी की आस” टीम के सदस्य के बातचीत पर आधारित है।)

निवेदन- अगर यह सच्ची और प्रेरक कहानी पसंद आई हो तो लाइक/कमेंट/शेयर करें। यदि आपके आस-पास भी इस तरह की कहानी है तो हमें Email या Message करें, हमारी टीम जल्द आपसे संपर्क करेगी। साथ ही फ़ेसबूक पर कोसी की आस का पेज https://www.facebook.com/koshikiawajj/ लाइक करना न भूलें, हमारा प्रयास हमेशा की तरह आप तक बेहतरीन लेख और सच्ची कहानियाँ प्रस्तुत करने का है और रहेगा।

टीम- “कोसी की आस” ..©

 

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