बिहार : “समर्पण और संघर्ष के बल पर बिहार का लाल बना मैथेमेटिक्स गुरु”

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स्पेशल डेस्क

कोसी की आस@पटना

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“बहुत मुश्किल से मिलती है ज़िंदगी, चाहे वो जिस रूप में भी मिले”। कुछ कर गुजरने का जज़्बा और अगर उसे सलिके से संवारना आ गया तो मामूली व्यक्ति भी स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज हो सकता है। जहाँ एक तरफ हमलोग अपनी छोटी-छोटी मुश्किलों से परेशान होते रहते हैं, वहीं हमारे बीच के ही कुछ शख़्स अपने समर्पण और संघर्ष से सफलता की लकीर खींच हमें नसीहत दे जाते हैं कि समस्या का समाधान हाथ-पर-हाथ धरे बैठे रहने के बजाय समर्पण और संघर्ष से दूर किया जा सकता है। कोसी की आस” टीम आज़ अपने प्रेरक कहानी शृंखला की साप्ताहिक और 39वीं कड़ी में आज दो ऐसे ही ऊर्जावान व्यक्तित्व की कहानी से आपसभी को मुखातिब कराने जा रही है, जिनके लिए अगर कहा जाय कि उनका और समस्या का अन्योनाश्रय संबंध है तो यह अतिशयोक्ति नहीं होगी।

मुनव्वर राणा की प्रसिद्ध पंक्ति के साथ आज़ इस खूबसूरत कहानी की शुरुआत करना चाहूँगा कि –

“किसी के हिस्से में मकां आई,

किसी के हिस्से में दुकां आई,

मैं सबसे छोटा था,

मेरे हिस्से में माँ आई॥

 

बिहार की जयंती देवी और आरती देवी ने संघर्ष के दम पर अपने बेटों को बनाया देश का गौरव:-

 

माँशब्द जितना संक्षिप्त है, उतना ही उसका सार विशाल है। ‘माँ’ ही है, जो अपने बच्चे पर कोई मुश्किल आने ही नहीं देती। फिर चाहे मुश्किलों के सामने उसे खुद ही क्यों न आना पड़े। हम ऐसी माताओं को नमन करते हैं, अभिनंदन करते हैं, जिन्होंने खुद अकेले दम पर अपने बच्चों की जिंदगी संवारी। कांटों भरी राह पर खुद चलीं लेकिन बच्चों को इसका एहसास तक नहीं होने दिया। आइए रूबरू कराते है कुछ ऐसी ही माताओं से जो बिना पति के, बच्चों को अकेले संभाल बनाया देश का गौरव। आज कोसी की आस” टीम “सपुर 30” फेम आनंद कुमार की माँ जयंती देवी और मैथमेटिक्स गुरु फेम आरके श्रीवास्तव की माँ आरती देवी के संघर्षो से आपको रूबरू कराने जा रही है।

 

 

आरती देवी (आरके श्रीवास्तव की माँ)-

 

वर्तमान में देश-विदेश में मैथेमेटिक्स गुरु के नाम से चर्चित आरके श्रीवास्तव बचपन जब महज़ पांच वर्ष के थे तभी उनके पिता परास नाथ लाल इस दुनिया को छोड़ चले गये। पिता के न होने से एक परिवार को आर्थिक और सामाजिक रूप से कितना तकलीफे झेलना होता है, यह हम समझ सकते हैं। आरती देवी ने काफी गरीबी के दौर से गुजरते हुए अपने बेटे रजनी कांत श्रीवास्तव (आरके श्रीवास्तव) को पढ़ा लिखा एक काबिल इंसान बनाया। आरके श्रीवास्तव बताते है कि माँ के आशिर्वाद के बिना कोई भी उपलब्धि को पाना असंभव था। श्री श्रीवास्तव बताते हुये कहते हैं कि मेरी सफलता में माँ के योगदान को शब्दों में बताना सम्भव नहीं है। तमाम कागज और स्याही भी कम पड़ जाएंगे, मेरी माँ के संघर्षों को बयां करने में। पति के बिना अकेले दम पर बेटे बेटियो को पालना-पोषणा और उन्हें पढ़ा लिखा काबिल इंसान बनाना। बचपन में गरीबी के दिन ऐसे रहे कि कभी खाली पेट बिना भोजन किये सोना पड़ता था, माँ खुद अपने हिस्से की रोटी हमे दे देती और खुद खाली पेट सो जाती। लेकिन एक कहावत है न कि “हर अंधेरे के बाद उजाला जरूर आता है”, आरके श्रीवास्तव बचपन से ही पढ़ने में अधिक रुचि रखते, खासकर गणित विषय पर। जब आरके श्रीवास्तव वर्ग 7 में थे तो वे 8वी के छात्रों को गणित का सवाल बता देते थे। अपने वर्ग से हमेशा आगे के प्रश्नों को हल करते, छात्रों को पढ़ाने से जो भी लोग अपनी इच्छा से जो पैसा देते उससे आरके श्रीवास्तव अपने आगे की पढ़ाई का खर्च निकालते।

जिम्मेदारी कब किसको किस उम्र में निभाना पड़े। यह सब समय के चक्र पर निर्भर है। लेकिन वो कहते हैं ना कि यदि ईश्वर हमसे कुछ छीनते हैं तो हमें उसे सहन करने की शक्ति भी देते हैं। और उसी शक्ति को पाकर आरती देवी ने अपने संघर्ष के बल पर अपने बेटे-बेटियो को पढ़ाया-लिखाया तथा बेटियो की शादी भी शिक्षित परिवार में किया।

आरके श्रीवास्तव बताते है कि पाँच वर्ष के उम्र में ही पिता को खोने का गम अभी दिल और मन दोनों से मिटा भी नही था कि पिता तुल्य इकलौते बड़े भाई भी इस दुनिया को छोड़ चले गये। पापा का चेहरा तो हमें याद भी नही, बस कभी रात को सोते वक्त सोचता हूँ तो धुंधला-धुंधला सा दिखाई देता है। माँ ने पिताजी और भैया के गुजरने के बाद भी हमें यह अहसास तक नहीं होने दिया कि उसके जीवन पर कितना बड़ा पहाड़ टूटा है। पूरे परिवार को वो सारी खुशियाँ देते रही जो एक माध्यम वर्गीय परिवार का जरूरत होती है।

 

माँ ने पापा की कमी, कभी हमें महसूस नहीं होने दिया। वे अपने क्षमता से भी बढ़कर हर वह जरूरी आवश्यकता जैसे कॉपी, किताबे, खिलौने आदि उपलब्ध कराती। श्री श्रीवास्तव आगे बताते हैं कि माँ के आशिर्वाद के बिना कोई भी उपलब्धि को पाना असंभव था, आज मैं जो कुछ भी हूँ, वह माँ के आशीर्वाद से संभव हुआ है।

 

आपको बताते चले कि दिन प्रतिदिन अपने ज्ञान और कौशल के बल पर देश-विदेश में अपना पहचान बना चुके चर्चित मैथेमेटिक्स गुरू आर के श्रीवास्तव ने लोगो को संदेश देते हुए माँ के महत्ता के बारे मे समझाया। वर्ल्ड बुक ऑफ रिकॉर्ड होल्डर, एशिया बुक ऑफ रिकॉर्ड होल्डर एवं इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड होल्डर मैथमेटिक्स गुरु फेम ने बताया कि आज मै जो कुछ भी हूँ तथा मेरे साथ जुड़ रहे निरंतर उपलब्धियां सब माँ के आशीर्वाद और उनके द्वारा दिये गए निरंतर संस्कारो से हो रहा है। आपको बता दें कि आरती देवी ने अपने सँघर्ष के बल पर गरीबी को काफी पीछे छोड़ते हुए आरके श्रीवास्तव के सपने को लगाया पंख।

 

बिहार का मान सम्मान को विश्व पटल पर बढ़ाने वाले मैथमेटिक्स गुरु फेम आरके श्रीवास्तव हजारो स्टूडेंट्स के रोल मॉडल है। सैकड़ो गरीब प्रतिभाओ के सपने को आईआईटी, एनआईटी, एनडीए, बीसीईसीई में सफलता दिलाकर लगा चुके है पंख। अमेरिकी विवि डॉक्टरेट की मानद उपाधि से कर चुका है सम्मानित। वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में भी नाम है दर्ज।

 

जिन स्टूडेंट्स के पास कुछ नही वे भी जाते आईआईटी, एनआईटी सहित देश की प्रतिष्टित संस्थाओ में,

 

पिछले 10 वर्षों से गरीब बच्चो को गणित पढ़ा रहे आरके श्रीवास्तव—-

 

प्रतियोगिता का दौर, गिरता शिक्षा स्तर और स्टूडेंट्स की मजबूरी– शायद इन्ही कारणों से कोचिंग संस्थानों का बाजार गर्म है। लेकिन शिक्षा के व्यवसायीकरण के इस दौर में बिहार के युवा गणितज्ञ मैथमेटिक्स गुरु फेम आरके श्रीवास्तव के लिए शिक्षा कोई ‘बजारू’ चीज नही है। वे छात्रों का भविष्य सवारने और कोचिंग संस्थानों को करारा जवाब देने के लिए पिछले 10 वर्षो से निःशुल्क शिक्षा दे रहे है।

आमतौर पर शिक्षा स्तर का गिरावट का सबसे बड़ा खामियाजा इंजीनियरिंग और मेडिकल जैसे तकनीकी विषयो की पढ़ाई करने वाले छात्र-छात्राओं को भुगतना पड़ रहा है। जिन्हें कोचिंग के लिए लाखों रुपये देने पड़ रहे है। पिछले कई वर्षो से आरके श्रीवास्तव रेगुलर क्लासरूम प्रोग्राम के तहत वंडर किड्स प्रोग्राम, निःशुल्क मैथमेटिक्स क्लासेज के अलावा शिविर लगाकर इंजीनियरिंग की प्रवेश परीक्षा की तैयारी कर रहे हजारो गरीब स्टूडेंट्स को नाईट क्लासेज प्रारूप के माध्यम से पूरे रात लगातार 12 घण्टे तक गणित के सवाल हल करने की नई-नई तकनीको और बारीकियों की जानकारी दे रहे। आरके श्रीवास्तव के नाईट क्लासेज प्रारूप के तहत लगातार 12 घण्टे निःशुल्क शिक्षा देने हेतु इनका नाम वर्ल्ड रिकॉर्ड, एशिया बुक ऑफ रिकॉर्ड एवं इंडिया बुक ऑफ रिकार्ड्स में दर्ज हो चुका है।

उनका दावा है कि इस शिविर में पढ़ाई करने वाले में से प्रत्येक वर्ष 60% से अधिक छात्र-छात्राएं आईआईटी, एनआईटी, एनडीए सहित तकनीकी प्रवेश परीक्षाओं में सफल होते है। छात्रों के इस नाईट क्लासेज शिविर की ओर आकर्षित होने के कारण आज़ वे हजारो स्टूडेंट्स के रोल मॉडल बन चुके है। मैथमेटिक्स गुरु आरके श्रीवास्तव न सिर्फ बिहार में लोकप्रिय है बल्कि अपने गणित पढ़ाने के जादुई तरीके एवं गणितीय शोध के लिए प्रायः सुर्खियों में भी रहते है। क्लासरूम प्रोग्राम में पाइथागोरस प्रमेय को बिना रुके 50 से ज्यादा अलग-अलग तरीको से सिद्ध कर आरके श्रीवास्तव ने गणित विरादरी में काफी वाहवाही लुटा। इसके लिए इनका नाम वर्ल्ड बुक ऑफ रिकार्ड्स लंदन में भी दर्ज हो चुका है। ब्रिटिश पार्लियामेंट के सांसद वीरेंद्र शर्मा ने आरके श्रीवास्तव के इस उपलब्धि के लिए इन्हें बधाई और भविष्य के लिए शुभकामनाएं भी दिया। गूगल बॉय कौटिल्य पंडित के गुरु के रूप में भी देश इन्हें जानता है।

फिलहाल वह गरीब छात्रों को निःशुल्क शिक्षा देने में जुटे हुए है। उनके इस प्रयास से प्रभावित होकर अलग- अलग क्षेत्रों के उच्चे ओहदे के कुछ लोगो ने शिविर में बतौर अतिथि शिक्षक छात्र-छात्राओ को पढ़ाया। बकौल आरके श्रीवास्तव कहते है कि गणित की शिक्षा देना मेरा पेशा नही बल्कि शौक है, व्यवसायिक शिक्षण में छात्र- छात्राओं और शिक्षकों के बीच परस्पर प्रेम और विश्वास का संबंध नही रह पाता।

आपको बताते चले कि आरके श्रीवास्तवा के नाईट क्लास के मॉडल को जानने और समझने के लिए अभिभावक सहित शिक्षक भी उनके क्लास में बैठते है कि आख़िर कैसे आर के श्रीवास्तव पूरे रात लगातार 12 घण्टे विद्यार्थियों को पूरे अनुसाशन के साथ मैथमेटिक्स का गुर सीखा रहे हैं। सुबह क्लास खत्म होने के बाद स्टूडेंट्स के माता पिता इस बात से काफी चकित थे कि मेरा बेटा-बेटी घर पर जहाँ एक घण्टे भी ठीक से पढ़ नही पाते, उन्हें आरके श्रीवास्तव ने लगातार पूरे रात 12 घण्टे तक अनुसाशन के साथ बैठाकर मैथमेटिक्स का गुर सिखाया। उन्हें सेल्फ स्टडी के प्रति प्रेरित किया गया कि कैसे आप पूरे रातभर पढ़ सकते है। आर के श्रीवास्तव के नाइट क्लास के रूप मे लगातार पूरे 12 घंटे बच्चों को शिक्षा देने के मुहिम अब देशव्यापी रूप लेने लगा है। आर के श्रीवास्तव को देश के विभिन्न राज्यों के शैक्षणिक संस्थाएँ गेस्ट फैक्लटी के रूप मे अपने यहाँ शिक्षा देने के लिए बुलाती है।

क्लास देखकर बच्चे सहित शिक्षक भी श्रीवास्तव को धन्यवाद देते है कि पढ़ाने की ऐसी कला सारे शिक्षकों मे आ जाये तो कोई बच्चा शिक्षा से अपने को दूर नही कर पायेगा और सफलता भी उसके कदम चूमेगी। रोहतास निवासी आरके श्रीवास्तव बताते हैं कि उन्हें बचपन से ही गणित में बहुत अधिक रुचि थी जो नौंवी और दसवी तक आते-आते परवान चढ़ी।

आर के श्रीवास्तव का बचपन भी काफी गरीबी से गुजरा है, परन्तु अपने कड़ी मेहनत, उच्ची सोच और पक्के इरादे के बल पर आज देश में मैथमेटिक्स गुरु के नाम से मशहूर हैं, वे कहते हैं कि मेरे जैसे देश के कई बच्चे होंगे जो पैसों के अभाव में पढ़ नहीं पाते। आरके श्रीवास्तव अपने छात्रों में एक सवाल को अलग-अलग तरीके से हल करना भी सिखाते हैं। वे सवाल से नया सवाल पैदा करने की क्षमता का भी विकास करते है।

 

पुरस्कार—

वर्ल्ड बुक ऑफ रिकार्ड्स लंदन से सम्मानित, इंडिया बुक ऑफ रिकार्ड्स में नाम दर्ज, एशिया बुक ऑफ रिकार्ड्स में नाम दर्ज, बेस्ट शिक्षक अवॉर्ड, इंडिया एक्सीलेन्स प्राइड अवॉर्ड, ह्यूमैनिटी अवॉर्ड, इंडियन आइडल अवॉर्ड, युथ आइकॉन अवॉर्ड सहित दर्जनों अवॉर्ड आरके श्रीवास्तव को उनके शैक्षणिक कार्यशैली के लिए मिल चुके है। आज़ आरके श्रीवास्तव न सिर्फ बिहार बल्कि समूचे देश का गौरव बन चुके हैं।

 

जयंती देवी (आनंद कुमार की माँ)—-

 

“सुपर 30” फेम आनंद कुमार को आज़ कौन नहीं जनता लेकिन पिता के गुजरने के बाद उनकी माँ ने उन्हें जिस परिस्थिति में आगे बढ़ाया वो असंभव सा लगता है। घर चलाने आनंद की माँ जयंती देवी पापड़ बनाती और आनंद उसे बेचते। “सुपर 30” फेम आनंद कुमार भी कहते है कि पापा और मम्मी दोनों की बहुत इच्छा थी कि मैं ख़ूब पढ़ूँ लेकिन एक सुनहरे सपने के साथ जो हुआ, वो झकझोरने वाला था लेकिन उसके बाबजूद माँ ने हमें बख़ूबी संभाला और आज मैं जो कुछ भी हूँ, माँ के आशीर्वाद और उनके दिखाए रास्ते की वजह से। हम उन तमाम माताओ को प्रणाम करते है जिन्होंने अपने सँघर्ष के बल पर अपने बच्चो को समाज मे युवायों के लिए रोल मॉडल बनाया। शिक्षा के क्षेत्र में पटना के आनंद कुमार और उनकी संस्था ‘सुपर 30’ को कौन नहीं जानता। हर साल आईआईटी रिजल्ट्स के दौरान उनके ‘सुपर 30’ की चर्चा अखबारों में खूब सुर्खियाँ बटोरती हैं। आनंद कुमार अपने इस संस्था के जरिए गरीब मेधावी बच्चों के आईआईटी में पढ़ने के सपने को हकीकत में बदलते हैं। सन् 2002 में आनंद सर ने सुपर 30 की शुरुआत की और तीस बच्चों को नि:शुल्क आईआईटी की कोचिंग देना शुरु किया। पहले ही साल यानी 2003 की आईआईटी प्रवेश परीक्षाओं में सुपर 30 के 30 में से 18 बच्चों को सफलता हासिल हुई। उसके बाद 2004 में 30 में से 22 बच्चे और 2005 में 26 बच्चों को सफलता मिली। इसीप्रकार सफलता का ग्राफ लगातार बढ़ता गया। सन् 2008 से 2010 तक सुपर 30 का रिजल्ट सौ प्रतिशत रहा।

आज आनंद कुमार राष्ट्रीय व अंतराष्ट्रीय मंचों को संबोधित करते हैं। उनके सुपर 30 की चर्चा विदेशों तक फैल चुकी है। कई विदेशी विद्वान उनका इंस्टीट्यूट देखने आते हैं और आनंद कुमार की कार्यशैली को समझने की कोशिश करते हैं। आनंद कुमार को विश्व के तमाम प्रतिष्ठित विश्विद्यालय अपने यहाँ सेमिनार के लिए भी बुलाती है। आनंद कुमार का नाम पूरी दुनिया जानती है और इसमें कोई शक नहीं कि आनंद कुमार न सिर्फ बिहार बल्कि वैश्विक गणित के गौरव हैं।

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