प्राइवेट जेट न खरीद, कैलिफ़ोर्निया से Zoho Corporation को तमिलनाडु के गाँव में लाने वाले श्रीधर

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कोशी की आस टीम अपने पाठकों के लिए एक बहुत ही प्रेरक कहानी और सच्ची कहानी ढूंढ़ कर आपलोगों के सामने लाई है। इस कहानी में हम जिस प्रेरक व्यक्तित्व के बारे में बताने जा रहे हैं, वे अगर सिर्फ अपने हित के लिए सोचते तो तमाम शान-सौकत के साथ वो अपना और अपने आने वाले पीढियों के जीवन को सुरक्षित कर सकते थे।

लेकिन वो कहते हैं न कि अपनी मिट्टी, अपना संस्कार, अपनी संस्कृति के बदलते मायने के बीच भी कुछ ऐसे लोग हैं जो अपना का मतलब सिर्फ खुद और खुद के बच्चे को नहीं समझते, वो मानव समाज को अपना समझते हैं, जिस परिवेश में पले-बढ़े, जिस मिट्टी में लोट-पोट होकर गिरे-उठे, उसे अपना समझते हैं।

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सोनी सही नाम के फ़ेसबुक यूज़र ने अपने फेसबुक माध्यम से जो लिखा है आइये सुनते है उनकी ज़ुबानी श्रीधर की कहानी….

उनका अगला लक्ष्य, प्राइवेट जेट खरीदना होना चाहिए था।
वैसे भी, किसी की कुल सम्पत्ति अगर 18 हज़ार करोड़ रूपए की हो, तो 300 करोड़ रूपए के प्राइवेट जेट विमान खरीदने पर ऑडिटर, सीए या फिर कोई शुभचिंतक भी एतराज नहीं करेगा। और जब पैसा अथाह हो तो फिर मुश्किल ही क्या है?

यूँ भी, लक्ष्मी जब छप्पर फाड़कर धन बरसाती हैं, तो ऐसे फैसले किसी को खर्चीले नहीं लगते। शायद इसलिए एक खरबपति के लिए जेट विमान ख़रीदना ऐसा ही है जैसे किसी मैनजेर के लिए मारुती कार खरीदना। लेकिन जोहो कारपोरेशन (Zoho Corporation) के चेयरमैन, श्रीधर वेम्बू पर लक्ष्मी के साथ-साथ सरस्वती भी मेहरबान थीं। इसलिए उनके इरादे औरों से बिलकुल अलग थे।

प्राइवेट जेट खरीदना तो दूर, उन्होंने अपनी कम्पनी बोर्ड के निदेशकों से कहा कि वे अब कैलिफ़ोर्निया (अमेरिका) से जोहो कारपोरेशन का मुख्यालय कहीं और ले जाना चाहते हैं। श्रीधर के इस विचार से कम्पनी के अधिकारी हतप्रभ थे..

क्योंकि सॉफ्टवेयर इंडस्ट्री के लिए कैलिफ़ोर्निया के बे-एरिया से मुफीद जगह दुनिया में और कोई है ही नहीं। गूगल, एप्पल , फेसबुक, ट्विटर या सिस्को, सब-के-सब इसी इलाके में रचे-बसे, फले-फूले।

किन्तु श्रीधर तो और भी बड़ा अप्रत्याशित फैसला लेने जा रहे थे। वे कैलिफ़ोर्निया से शिफ्ट होकर सीएटल या हूस्टन नहीं जा रहे थे। वे अमेरिका से लगभग 13000 किलोमीटर दूर चेन्नई वापस आना चाहते थे।

उन्होंने बोर्ड मीटिंग में कहा कि अगर डैल, सिस्को, एप्पल या माइक्रोसॉफ्ट अपने दफ्तर और रिसर्च सेंटर भारत में स्थापित कर सकते हैं तो जोहो कारपोरेशन को स्वदेश लौटने पर परहेज़ क्यों है?

श्रीधर के तर्क और प्रश्नों के आगे बोर्ड में मौन छा गया। फैसला हो चुका था। आई आई टी मद्रास के इंजीनियर श्रीधर वापस मद्रास जाने का संकल्प ले चुके थे। उन्होंने कम्पनी के नए मुख्यालय को तमिलनाडु के एक गाँव (जिला टेंकसी) में स्थापित करने के लिए 4 एकड़ जमीन पहले से खरीद ली थी। और एलान के मुताबिक, अक्टूबर 2019, यानि ठीक एक साल पहले श्रीधर ने टेंकसी जिले के मथलामपराई गाँव में जोहो कारपोरेशन का ग्लोबल हेडक्वार्टर शुरू कर दिया। यही नहीं, 2.5 बिलियन डॉलर के जोहो कारपोरेशन ने पिछले ही वर्ष सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट कारोबार में 3,410 करोड़ रूपए का रिकॉर्ड राजस्व प्राप्त करके टेक जगत में बहुतों को चौंका भी दिया।

स्वदेश क्यों लौटना चाहते थे श्रीधर?

श्रीधर, अमेरिका की किसी एजेंसी या बैंक या स्टॉक एक्सचेंज के दबाव के कारण स्वदेश नहीं लौटे। उनपर प्रतिस्पर्धा का दबाव भी नहीं था। वे कोई नया व्यवसाय भी नहीं शुरू कर रहे थे। वे किसी नकारात्मक कारण से नहीं, एक सकारात्मक विचार लेकर वतन लौटे। उन्होंने कई वर्ष पहले संकल्प लिया था कि अगर जोहो ने बिज़नेस में कामयाबी पायी तो वे प्रॉफिट का बड़ा हिस्सा स्वदेश में निवेश करेंगे। कम्पनी के मुनाफे को वे गाँव के बच्चों को आधुनिक शिक्षा देने पर भी खर्च करेंगे। इसी इरादे से उन्होंने सबसे पहले मथलामपराई गाँव में बच्चों के लिए निशुल्क आधुनिक स्कूल खोले।

कंप्यूटर टेक्नोलॉजी के जानकार श्रीधर गाँव में ही जोहो विश्वविद्यालय भी बना रहे हैं जहाँ भविष्य के सॉफ्टवेयर इंजीनियर तैयार होंगे। फोर्ब्स मैगज़ीन में दिए एक इंटरव्यू में श्रीधर बताते हैं कि टेक्नोलॉजी को अगर ग्रामीण इलाकों से जोड़ा जाए तो गाँव से पलायन रोका जा सकता है। “गाँव में प्रतिभा है, काम करने की इच्छा है…अगर आधुनिक शिक्षा से हम बच्चों को जोड़े तो एक बड़ा टैलेंट पूल हमे गाँव में ही मिल जायेगा। इसीलिए मैं भी बच्चों की क्लास में जाता हूँ, उन्हें पढ़ाता भी हूँ। श्रीधर बताते हैं कि मेरी कोशिश गाँव को सैटेलाइट से जोड़ने की है। हम न सिर्फ दूरियां मिटा रहे हैं, न सिर्फ पिछड़ापन दूर कर रहे हैं, बल्कि शहर से बेहतर डिलीवरी गाँव से देने जा रहे है….प्रोडक्ट चाहे सॉफ्टवेयर ही क्यों न हो।

तस्वीरें ज़ाहिर करती हैं कि श्रीधर बेहद सहज और सादगी पसंद इंसान हैं। वे लुंगी और बुशर्ट में ही अक्सर आपको दिखेंगे। गाँव और तहसील में आने-जाने के लिए वे साईकिल पर ही चल निकलते हैं। उनकी बातचीत से, हाव भाव से, ये आभास नहीं होता कि श्रीधर एक खरबपति सॉफ्टवेयर उद्योगपति हैं जिन्होंने 9 हज़ार से ज्यादा लोगों को रोजगार दिया है जिसमे अधिकाँश इंजीनियर है। उनकी कम्पनी के ऑपरेशन अमेरिका से लेकर जापान और सिंगापुर तक फैले हैं, जहाँ 9,300 टेक कर्मियों को रोजगार मिला है।

श्रीधर का कहना है कि आने वाले वर्षों में वे करीब 8 हज़ार टेक रोजगार भारत के गाँवों में उपलब्ध कराएंगे और ग्लोबल सर्विस को देश के नॉन-अर्बन इलाकों में शिफ़्ट करेंगे। शिक्षा के साथ गाँवों में वे आधुनिक अस्पताल, सीवर सिस्टम, पेयजल, सिंचाई, बाजार और स्किल सेंटर स्थापित कर रहे हैं।

एक सवाल अब हम सभी से

क्या कारण है कि देश में श्रीधर जैसे हीरों की परख जनता नहीं कर पाती? क्या कारण है कि हम असली नायकों को नज़रअंदाज़ करके छद्म नायकों को पूजते हैं? श्रीधर चाहते तो आज कैलिफ़ोर्निया में निजी जेट विमान पर उड़ रहे होते, सेवन स्टार लक्ज़री विला में रहते, अपनी कमाई को विदेश में ही निवेश करते जाते … आखिर उन्हें स्वदेश लौटने की ज़रुरत ही क्या थी? फिर भी उनके त्याग का देश संज्ञान नहीं लेता?

क्या कीचड़ उछाल और घृणा-द्वेष से रंगे इस देश में अब श्रीधर जैसे लोग अप्रासंगिक हो रहे है ?

या हम लोग इतने निकृष्ट और निर्लज होते जा रहे हैं कि नर में नारायण की जगह नालायक ढूंढने लगे हैं ?

श्रीधर जैसे अनेक ध्रुव तारे आज देश को आलोकित कर रहे हैं पर इन तारों की चमक, समाज को चौंधियाती नहीं है। उनके कर्म, न्यूज़ चैनल की सुर्खियां को रौशन नहीं करते हैं।
और जिन्हे सुबह शाम, रौशन किया जा रहा है वे अँधेरे के सिवा आपको कुछ दे नहीं सकते।

मेरा आग्रह आपसे है, अगर बच्चों का भविष्य बदलना है तो कुछ देर के लिए न्यूज़ चैनल बंद कीजिये और अपने आस-पास अपने गाँव-देश में श्रीधर ढूंढिए।

उक्त आलेख कोशी की आस के लिए सहरसा से ताल्लुक रखने वाले तथा चेन्नई के एक मल्टीनेशनल कंपनी के लंदन स्थित कार्यालय में कार्यरत राजू कुमार ने संकलित किया है।

Cr- Soni sahi k fb s

राजू कुमार,
स्पेशल डेस्क
कोशी की आस@लंदन

 

 

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