डीईओ की नौकरी छोड़ मध्यप्रदेश लोक सेवा आयोग के जिला बाल संरक्षण अधिकारी बनने की कहानी

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कोसी की आस एक प्रयास है, जिसका उदेश्य सिर्फ समाचार प्रस्तुत करने के बजाय, हमारे आस-पास की नित्य नई-नई प्रेरक और सच्ची कहानी आप सबके सामने परोसकर हर उन युवाओं में “एक उम्मीद की किरण” जगाने का है, जो अपनी सफलता के लिए पूरे मन या आधे मन से जुटे हैं। सबसे पहले हम अपने इस छोटे से प्रयास के माध्यम से ऊर्जा के असीम स्रोत से ओत-पोत युवाओं को भारतरत्न, पूर्व प्रधानमंत्री और ओजस्वी महान कवि अटल बिहारी वाजपेई की अनुपम पंक्तियों भेंट करना चाहेंगे कि

छोटे मन से, कोई बड़ा नहीं होता,

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टूटे मन से, कोई खड़ा नहीं होता॥

आज़कल युवा अपनी सफलता को लेकर इतने आशंकित होते हैं कि अपने उस डर की वजह से अपनी क्षमता का लगभग 50% योगदान भी नहीं दे पाते और नतीजा आप जानते हैं। ठीक उसी प्रकार कई युवाओं को अपनी क्षमता का अंदाजा तक नहीं, वो क्या कर सकते हैं? उनकी हालत रामायण के उस हनुमान की तरह है, जिन्हें खुद पता नहीं कि उनकी शक्ति क्या है? या फिर रामायण उस बालि की तरह जो एक वरदान पाकर (तुम जिससे भी लड़ोगे, उसकी आधी शक्ति छीन हो, तुम्हारे पास आ जाएगी) घमंड में चूर हो गया था।  कोसी की आस” टीम अपने प्रेरक कहानी शृंखला की 27वीं कड़ी में कुछ हद तक इन्हीं संदर्भों से संबंधित दतिया, मध्यप्रदेश के सोंधा गाँव के श्री हरिशंकर अग्रवाल के सबसे छोटे और होनहार बेटे श्री आकाश अग्रवाल की कहानी आपके सामने परोसने जा रही है।

श्री आकाश भारतीय लेखा एवं लेखा परीक्षा विभाग में महज़ 19 वर्ष की उम्र में कर्मचारी चयन आयोग द्वारा आयोजित “संयुक्त उच्च-मध्यमिक स्तरीय परीक्षा” पास कर डाटा एंट्री ऑपरेटर के लिए चयनित हुये। हमारे समाज में अभी भी सरकारी नौकरी की इतनी अहमियत है कि लोगों ने श्री आकाश की इतनी कम उम्र की सफलता को बहुत सराहा और इस सफलता से हमेशा आगे बढ़ने की महत्वाकांक्षा रखने वाले श्री आकाश थोड़े शिथिल पड़ गए। अनमने ढंग से UPSC और राज्यों के PSC की तैयारी कर रहे थे। कभी-कभी कार्यालय से अवकाश लेकर, तो कभी कार्यालय के कार्य के साथ-साथ, किन्तु आकाश अपने प्रयास से परेशान थे, श्री आकाश के अनुसार मैं कार्यालय में रहकर भी खुश नहीं था, क्योंकि मेरी तैयारी PSC के लायक नहीं हो पा रही थी और इस वजह से मैं शत-प्रतिशत न पढ़ रहा था और न ही नौकरी कर पा रहा था। मैं बहुत परेशान रहने लगा एक तरफ नौकरी और दूसरी तरफ बेहतर भविष्य। सच कहूँ तो मैं अपनी आगे की पढ़ाई और नौकरी में सामंजस्य नहीं बैठा पा रहा था।

श्री आकाश आगे बताते हैं कि मुझे फिर से बचपन का दिन याद आ गया। मैं पढ़ाई में बचपन में अच्छा था, पाँचवीं कक्षा में समूचे तहसील में टॉप किया, तो ईगो ज्यादा हो गया कि मैं बहुत तेज हूँ, मैंने पढ़ना कम कर दिया तो सातवीं में एक सब्जेक्ट में सप्लीमेंट्री आ गया, बहुत बुरा लगा। लोगों ने खूब हँसी उड़ाई, तब पता चला कि कुछ भी हमेशा नहीं रहने वाला, कल पाँचवीं के परिणाम के बाद जो लोग मेरी तारीफ में नहीं थकते वो आज़ ???

श्री आकाश के बचपन के इस परिणाम और उसके बाद के जज्बे के लिए एक बार फिर माननीय पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेई की पंक्ति साझा करना चाहूँगा कि

क्या हार में, क्या जीत में,

किंचित नहीं, भयभीत मैं,

कर्तव्य पथ पर, जो भी मिला,

यह भी सही, वह भी सही,

वरदान नहीं मगूंगा,

हो कुछ पर, हार नहीं मानूंगा।।

श्री आकाश आगे बताते हैं कि मुझे समझ में आ गया था कि “यदि पढ़ोगे नहीं, तो कोई-न-कोई धक्का मार के आगे निकल जाएगा”। बस फिर से पढ़ाई में लग गया और लोगों की सुनना बंद कर दिया। हम चार भाई हैं, घर की हालात अच्छी नहीं थी और पापा भी हमलोगों के पढ़ाई के प्रति उतने सजग नहीं थे और ऊपर से उनकी शराब की लत। पीते हैं तो घर की हालत इतनी अच्छी नहीं थी। तीनों बड़े भैया एमबीए, पीएमटी और कंपटीशन की तैयारी के लिए ग्वालियर रह रहे थे, तो पापा ने शर्त रखी, कि अगर ग्वालियर जाकर आगे की पढ़ाई करनी है तो 12वीं में पचासी परसेंट (85%) से ऊपर लानी पड़ेगी, उस वक्त 85% से अधिक अंक लाने पर मुख्यमंत्री जी के द्वारा ₹25000 अवार्ड के रूप में दिए जाते थे। बस लग गया, आखिर भविष्य का जो सवाल था। परिणाम आया और अविश्वसनीय 87% अंक के साथ, एक बार फिर से तहसील टॉपर। फिर किसी ने कहा कि डीएड करके टीचिंग में लग जाओ, तो किसी ने पोस्ट ऑफिस में क्लर्क बनने की तो किसी ने इंजीनिरींग करने की सलाह दी। लेकिन मेरे भैया जानते थे कि अब कंपटीशन का जमाना है, तो उन्होंने मेरी बैंक की कोचिंग लगवा दी और संयोग देखिये कि बैंक तो निकला ही, लगे हाथ SSC (CHSL) में भी पास हो गया, जिसका मुझे अंदाजा तक नहीं था।

बारहवीं विज्ञान से, स्नातक वाणिज्य से और परास्नातक हिन्दी साहित्य से करने वाले बहुमुखी प्रतिभा के धनी श्री आकाश बताते हैं कि SSC (CHSL) में चयन के बाद नौकरी करने लगा लेकिन लंबे समय से एक ही संस्थान में कार्यरत रहने से आगे बढ़ने के खुद का भरोसा कमजोर हो रहा था, लगा शायद नहीं हो पाएगा। फिर भाईयों, दोस्तो एवं ऑफिस के कुछ सर और कलिग ने कहा कि तेरा लक अच्छा है और 19 की उम्र से जॉब कर रहा है, बस एक बार सही से तैयारी करो, कुछ बेहतर के लिए सोचो हो जाएगा। अगर जॉब से दिक्कत हो रही हो तो छोड़ दो, जो होगा देखा जाएगा। उनके भरोसे को देखा, तो लगा, करते है और जॉब  छोड़ दी। कुछ लोगो ने कहा कि बड़ी मुश्किल से लगती है इतनी अच्छी जॉब, नहीं छोड़नी चाहिए। कभी-कभी मुझे भी डर लग रहा था कि होगा कि नहीं?

खैर हिम्मत जुटा जॉब छोड़कर पीएससी की तैयारी में जुट गया,  सच में लक जबर्दस्त निकला। प्री, मैंस और इंटरव्यू बहुत जल्दी-जल्दी निकल गया और अंततः मैंने सफलता पाई और मैं मध्यप्रदेश लोक सेवा आयोग के जिला बाल संरक्षण अधिकारी के रूप में सफल हुआ। अब आगे यूपीएससी का सोचा है, लेकिन अभी पीएससी जैसी कोई प्रेरणा नहीं मिली है और तैयारी भी कुछ खास अच्छी नहीं चल रही है, लेकिन मैं विश्वास दिलाना चाहूँगा कि मैं एक बार फिर से सिद्दत से जुटना चाहता हूँ। अंत में “कोसी की आस” परिवार के माध्यम से वर्तमान में प्रयासरत दोस्तों से माननीय अटल बिहारी वाजपेयी की पंक्तियों के माध्यम से ही कहना चाहूँगा कि

हार नहीं मानूँगा,

रार नहीं ठनूँगा,

काल के कपाल पर लिखता-मिटाता हूँ,

गीत नया गाता हूँ,

गीत नया गाता हूँ॥

मैं “कोसी की आस” टीम का आभार व्यक्त करना चाहूँगा कि मुझे आपने प्रेरणा योग्य समझा।

(यह श्री आकाश अग्रवाल से “कोसी की आस” टीम के सदस्य के बातचीत पर आधारित है।)

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टीम- “कोसी की आस” ..©

 

 

 

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