किसान परिवार के फर्श से अर्श तक पहुँचने की कहानी

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होंगी तुम्हारे पास, जमाने भर की डिग्रियाँ,

अगर किसी गरीब की छलकती आँखें,

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ना पढ़ सको, तो अनपढ़ हो तुम॥

बेहद कम शब्दों में कितनी बड़ी बात कह दी गई है। सचमुच, अगर आपने जरूरतमंद की मदद न की, तो किस बात के महान हो। आज़ कोशी की आस टीम अपने प्रेरक कहानी श्रृंखला के साप्ताहिक और 42वीं कड़ी में एक ऐसी ही सच्ची कहानी आपलोगों के लिय ढूँढ कर लाई है। एक गरीब किसान जिसके चार बच्चे थे और जो उन बच्चों को पढ़ाने तक में असमर्थ थे। उसी परिवार के फर्श से अर्श तक पहुँचने की कहानी कहें, तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।

जी हाँ, आज हम जानकीनगर, पूर्णियाँ के उस परिवार के बारे में बात करने जा रहे हैं, जिस परिवार ने एक बार फिर से साबित किया है कि शिक्षा किसी भी व्यक्ति, परिवार और समाज को कहाँ-से-कहाँ ले जा सकती है। तो आइये मिलते हैं उसी परिवार के मुखिया ओम प्रकाश यादव और नमिता देवी की सबसे बड़ी सुपुत्री और मेरे सपने हुये सच” पुस्तक की लेखिका प्रीति कुमारी से और जानते हैं उनकी और उनके परिवार के अबतक के संघर्ष से सफलता की कहानी।

यह कहानी है एक साधनहीन पिता की, जिन्होंने मुश्किलों के बावजूद भी अपने बच्चों को शिक्षा के औजार से सक्षम और शक्तिमान बनाने का प्रयास किया। वो कहते हैं न कि “भगवान भी उसी की मदद करते हैं, जो अपनी मदद खुद करता है” और उसी का नतीजा हुआ कि बहुत मुश्किलों से जूझ रहे परिवार को बिन्देश्वर पाठक जैसे व्यक्तित्व का साथ मिला।

सर्वोदय कन्या विद्यालय दिल्ली से दसवीं और बारहवीं पूर्ण करने वाली प्रीति बताती हैं कि यह जीवन गाथा व्यक्ति के भीतर आगे बढ़ने की जिजीविषा, समय के प्रत्येक पल और प्रत्येक संसाधन के सर्वोच्च उपयोग का शास्त्र है या फिर यूँ कहें कि चारों ओर से बेबस कर दिए गए एक पिता का जीवन समर में अपने पुत्र को कर्म क्षेत्र में अर्जुन बनाने के लिए दिया गया व्यवहारिक ज्ञान का दस्तावेज। प्रीति आगे बताती हैं कि हमलोग छोटे थे, घर की आर्थिक स्थिति बिल्कुल ठीक नहीं थी, फिर भी पापा गाँव में ही बच्चों को पढ़ा रहे थे, मेरा भाई सौरभ बचपन से ही पढ़ने में काफी तेज था और उसकी योग्यता को देखते हुये, सौरभ को जब वह महज़ सातवीं में थे तो स्नातक की उपाधि भूपेंद्र मण्डल विश्वविद्यालय द्वारा दी गई। सच बताऊँ तो यही घटना मेरे परिवार के लिए टर्निंग पॉइंट था। उस वक्त के समाचार पत्रों में मेरे भाई के बारे में खबर प्रकाशित हुई और उस खबर पर सुलभ इंटरनेशनल के फ़ाउन्डर बिन्देश्वर पाठक की नज़र गई। और उन्होंने मदद की ठानी, पापा-मम्मी और हम चार भाई-बहन दिल्ली आ गए, दिल्ली के स्कूल में हमलोगों का नामांकन कराया गया और दिल्ली में होने वाले तमाम खर्चों का वहन सुलभ इंटरनेशनल के फ़ाउन्डर बिन्देश्वर पाठक जी के द्वारा किया गया।

सौरभ कुमार

“यूँ ही नहीं मिलती, राही को मंजिल,

एक जुनून सा, दिल में जगाना होता है,

पूछा चिड़िया से, कैसे बना आशियाना,

बोली, भरनी पड़ती है उड़ान ,

बार-बार तिनका-तिनका उठाना होता है।”

 

मुक्त विश्वविद्यालय से स्नातक, परास्नातक और बी. एड. के उपरांत वर्तमान में स्वतंत्र लेखिका के रूप में हर संघर्ष को उसका स्थान मिले” को ध्येय वाक्य मानने वाली प्रीति समाज में पॉजीटिव रिपोर्टिंग को अपना लेखन मानती हैं। सामाजिक समस्याओं के बीच से जिंदगी तलाशने वालों को असली हीरो मानती  हैं। चार भाई-बहनों में सबसे बड़ी प्रीति ने लक्ष्य और संघर्ष के बीच लुकाछिपी के खेल को बहुत संजीदगी से लिया है, वह चाहती हैं कि बुरे लोग बदले ताकि समाज की मासूमियत को मंच मिल सके।

सामाजिक विषयों के अध्ययन तथा उससे संबंधित लेखन से अभिरुचि रखने तथा सामाजिक स्थितियों को एवं अपने माता-पिता को प्रेरणा मानने वाली प्रीति बताती हैं कि मैंने बचपन में सुना था कि एक बच्चे की कामयाबी में, पूरे गाँव का हाथ होता है। तब मैं इसका अर्थ नहीं समझती थी। पर अब मैं इसकी गहराई जान गई हूँ। केवल सुख ही आपको नहीं गढ़ते,  दुःख आपको ज्यादा बेहतर ढंग से तराशते हैं। माँ-पिताजी के योगदान के बारे में निःशब्द होते हुये बोलती हैं कि मैं उनके बारे में क्या बताऊँ हम तो उनकी रचना हैं।

सौरभ कुमार

अपने भाई सौरभ के बारे में बात करती हुई प्रीति बताती हैं कि भाई के विद्वता ने पूरे परिवार को नई ऊँचाई दिला दिया। Cornell University USA से मास्टर डिग्री लेने वाले प्रतिभाशाली सौरभ ने बेहद कम उम्र में ओरेकल और याहू जैसी कंपनी के लाखों रुपए के पैकेज को छोड़कर एक एनोरोइड एप क्यूब २६ नाम से स्टार्ट-उप खोला जिसे PayTm ने खरीद लिया और अब विद्युत से चलने वाली तिपहिया वाहन की कंपनी Eular Moter के संस्थापक हैं। उनके कंपनी के टेसला, बिग बास्केट और ईकॉम एक्सप्रेस जैसी कंपनियाँ लौजीस्टिक पार्टनर है। उनका एक भाई गौरव कुमार Purdue University USA से MBA तथा बहन पायल कुमारी University of Washington से MBBS कर रही हैं।

“ठोकरें नहीं खायेंगे जनाब

तो कैसे जानेंगे कि

आप पत्थर के बने हैं या शीशे के।”

उक्त खूबसूरत पंक्ति से शुरुआत करते हुये प्रीति आगे बताती हैं कि मुश्किलें पड़ीं इतनी कि ज़िंदगी आसान हो गयी। बस इतना ही कहना है कि कठिनाई कहने से तो कम होती नहीं, मुकाबला करने से कम होती है। मैंने अपने माता-पिता का संघर्ष देखा, अपने हिस्से का जिया,  अपने छोटे भाई-बहनों को भी हौसला देती रही। हालात बेहद मुश्किल थे, पर यह बात समझ में आ गई थी कि अपने वजूद की तलाश में कितनी बार भी टूटना पड़े, हर बार खुद को भीतर से संभाल के खड़ा होना है। जीवन संघर्ष के बारे में बात करते हुये बताती हैं कि जीवन संघर्ष का नाम है, संघर्ष से व्यक्तित्व निखरता है, बहुत कुछ सीखता है और समाज को सकारात्मक ऊर्जा से भी भरता है।

“हौसले के तरकश में,

कोशिश का वो तीर जिंदा रखो,

हार जाओ चाहे जिंदगी में सब कुछ,

मगर फिर से जीतने की उम्मीद जिंदा रखो।”

जब उनकी हालिया प्रकाशित प्रथम पुस्तकमेरे सपने हुये सच” के बारे में पूछा गया तो उन्होंने जो बताया- मेरे सपने हुये सच में एक पिता के साधन हीन होने के बावजूद अपने पुत्र को शिक्षा के औजार से सक्षम और शक्तिमान बनाने की महागाथा है। यह जीवन-कथा व्यक्ति के भीतर आगे बढ़ने की जिजीविषा को समय के प्रत्येक पल और समाज के प्रत्येक संसाधन के सर्वोच्च उपयोग का शास्त्र है। यह चारों ओर से बेबस कर दिए गए एक पिता का जीवन-समर में अपने असहाय पुत्र को कर्म क्षेत्र में अर्जुन बनाने के लिए दिया गया व्यवहारिक ज्ञान का दस्तावेज है। यह पुस्तक एक पूरे परिवार की संघर्ष यात्रा का चित्रण है। यह जीवन-कथा सामाजिक परिस्थितियों का सटीक बयान करती है और ढहते पारिवारिक मूल्यों के बीच संस्कारों पर आधारित जीवन शैली की स्थापना है। व्यापारिक लेन-देन को ही जीवन मूल्य मानने वाले समाज में नि:स्वार्थ भाव से मदद करने वाले उज्ज्वल चरित्र भी पुस्तक के प्राण बिंदु हैं। कुल मिलाकर पुस्तक इस दौर की जीवन व्यवस्था में व्यक्ति के चारित्रिक साहस की विजय-गाथा है, जो दुर्गम दुरावस्थाओं के दावानल से बाहर निकलने में समर्थ मार्ग दिखाती है। यह एक दिशा है- जीवन को सही मायनों में जीने और सपने को साकार करने के जज्बे की।

 

प्रीति कुमारी और उनके परिवार के अब तक की शानदार सफलता के लिए कोशी की आस परिवार की ओर से बहुत-बहुत शुभकामनायें। कोशी की आस परिवार, प्रीति और उनके परिवार के और बेहतर भविष्य की कमाना करती है।

(यह प्रीति कुमारी और कोशी की आस टीम के सदस्य के बीच हुई बातचीत पर आधारित है।)

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