वृक्षारोपण नहीं बल्कि वृक्ष मित्र बन वृक्षों को संजोने का अभियान

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आज़ की एक खूबसूरत घटना ने वर्ष 1983 की फ़िल्म “वो सात दिन” के मशहूर गाने प्यार किया नहीं जाता, हो जाता है, दिल दिया नहीं जाता, खो जाता है”……… को फिर से जीवंत कर दिया। भारतीय समाज का एक बड़ा वर्ग जहाँ सरकारी सेवा में कार्यरत लोगों के लिए अच्छा ख़याल नहीं रखते, वहीं महालेखाकार कार्यालय, रायपुर, छतीसगढ़ के कुछ अधिकारियों ने मिल कर अपने सरकारी सेवा और व्यक्तिगत कार्य करने के आलवे एक ऐसी पहल की है, जिसकी न सिर्फ सराहना की जानी चाहिए बल्कि उनलोगों का यह पहल समाज के लिए मिसाल कायम करने वाला है।

अरे मैंने गाने से शुरुआत कर खूबसूरत घटना बताए बगैर कहीं और जा रहा था। “कोसी की आस” टीम से बातचीत में “वृक्ष मित्र” टीम के सदस्य श्री जितेंद्र कुमार अग्रवाल ने बताया कि हुआ यूँ कि हमलोग 4-5 साथी एक साथ बैठे थे, वहीं किसी के मन में खायाल आया कि क्यों न हमलोग मिलकर अपने सरकारी और पारिवारिक ज़िम्मेदारी से समय निकालकर पर्यावरण के लिए कुछ काम करें, जिससे न सिर्फ पर्यावरण में सुधार होगा बल्कि हमसबको भी आत्मिक खुशी होगी कि हमसब ने भी इस समाज के पर्यावराणिक विकास में कुछ तो भागीदारी की। बस यहीं से शुरुआत हो गई। इसलिए मैंने प्रारंभ में कहा था कि प्यार किया नहीं जाता, हो जाता है, दिल दिया नहीं जाता, खो जाता है”……… ठीक उसी तर्ज़ पर “अच्छे कार्य की शुरुआत की नहीं जाती बल्कि हो जाती है”। किसी ने नाम सुझाया, तो किसी ने प्लान समझाया और हमसब आगे बढ़ गए। हमलोगों ने वृक्षारोपण अभियान चलाने का प्लान नहीं बनाया बल्कि हमलोगों ने यह तय किया कि हम न सिर्फ वृक्ष लगायेंगे बल्कि उस वृक्ष की कम-से-कम एक वर्ष तक देख-रेख की ज़िम्मेदारी भी लेंगे।

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उन्होंने आगे बताया कि प्रथम चरण में कार्यालय महालेखाकार (लेखापरीक्षा) रायपुर, छतीसगढ़ 53 लेखा परीक्षा अधिकारी के प्रयास से यह कार्य प्रारंभ किया गया है, जिसमें छतीसगढ़ उद्यानिकी विभाग, रायपुर द्वारा भी सहयोग प्रदान किया जा रहा है। प्रथम चरण में हमलोगों ने महालेखाकार आवासीय परिसर, महालेखाकार आवासीय परिसर को कार्यालय महालेखाकार से जोड़ने वाली सड़क के किनारे तथा कार्यालय महालेखाकार परिसर के वैसे स्थान जहाँ-जहाँ पेड़ लगाए जा सकते हैं, को एक लक्ष्य के रुय में लिया है। हम उम्मीद करते है कि आने वाले दिनों में और भी लोग जुड़ेंगे, और अबतक हमसबने सिर्फ पर्यावरण का दोहन किया है, यह एक छोटा सा किन्तु महत्वपूर्ण माध्यम है पर्यावराणिक विकास या सुधार का।

“कोसी की आस” टीम “वृक्ष मित्र” टीम के सभी सदस्यों को इस नेक पहल के लिए साधुवाद देती है। साथ ही समाज के सभी वर्गो से अपील करती है कि हम सभी को भी अपनी-अपनी क्षमता के अनुसार उस समाज के लिए कुछ-न-कुछ लौटाने का प्रयास करना चाहिए क्योंकि आज़ हम जो कुछ भी हैं, उसी समाज की बदौलत हैं।

 

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टीम- “कोसी की आस” ..©

 

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