कभी ऑटो चला होता था परिवार का भरण-पोषण और आज मैथेमैटिक्स गुरू बन सैकड़ों गरीब स्टूडेंट्स को बना रहे इंजीनियर।

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स्पेशल डेस्क
कोसी की आस@पटना।

आज हम आपको पिता के प्यारे पुत्र और बड़े भाई के आँखों का तारा (पिता और एकलौते बड़े भाई इस दुनिया में नहीं रहे) के सफलता की कहानी से रूबरू करा रहे हैं। हम बात कर रहे है मैथेमैटिक्स गुरू फेम आरके श्रीवास्तव के कड़े संघर्ष से मिली सफलता के बारे में, जो आज किसी परिचय का मोहताज नहीं और जिन्होंने बना दिया सैकड़ों निर्धन परिवार के छात्र-छात्राओं को इंजीनियर।

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आर के श्रीवास्तव बताते हैं कि 5 वर्ष की उम्र में ही पिताजी का साया सिर से उठ गया। पिताजी का चेहरा धुधला-धुंधला दिखाई देता है। बस उनकी तेजस्वी ज्ञान और सामाजिक कार्य बुजुर्गों से सुनने को मिलता है। पिताजी का आर्शीवाद और उनके दिये संस्कार हमारे परिवार के साथ हमेशा रहता है। पिताजी की बिमारी में भी बड़े भाई ने अपने पाॅकेट मनी से गुल्लक में जमा किये धनराशि से हाॅस्पिटल का बिल दिया था। पिताजी के गुजरने के बाद बहुत कम उम्र में ही परिवार चलाने की जिम्मेवारी बड़े भाई पर आ गई और पैसे के अभाव से मानो दुःखों का पहाड़ टूट गया। भरपेट भोजन मिलना भी नामुमकिन सा लगने लगा। तभी बड़े भाई शिवकुमार श्रीवास्तव ने परिवार का भरण-पोषण करने के लिए आपसी सहयोग से पैसा जुटाकर एक ऑटो रिक्शा खरीदा। रोहतास जिला के बिक्रमगंज शहर के मेन चौक से थाना चौक तक 1-1 रू में सवारी ढोकर परिवार का भरण -पोषण चलना प्रारम्भ हुआ। ऐसे ही समय बीतता गया, बड़े भाई ने पिता का फर्ज बखूबी निभाते हुए आर के श्रीवास्तव को पढाया लिखाया। आज से 5 वर्ष पहले वर्ष 2014 में बड़े भाई भी इस दुनिया को छोड़ चले गये। इस दु:ख से आर के श्रीवास्तव पूरी तरह टूट चुके थे।

आर के श्रीवास्तव कहते है कि ऐसा कोई दिन नहीं जब हम सभी अपने भैया को याद नहीं करते होंगे, लेकिन जब-जब रक्षाबंधन आता है बड़े भैया की कमी बहनों की आँखों में देखने को मिल जाता है। आँख के आँसू को थामकर जब हमें राखी बांधती है तो यह अहसास जरूर होता है कि हमने अपने बड़े भैया को ही नहीं बल्कि इंसान रूपी भगवान को खोया है। पिताजी के गुजरने के बाद बड़े भैया ने कैसे अपने दु:ख को सहते हुए पूरे परिवार को कोई कमी महसूस नहीं होने दिया। वो बताते हैं कि परिवार में सबसे अधिक हमें प्यार करते थे, मेरे भतीजा-भतीजियों से भी अधिक प्यार हमें करते थे, वे हमेशा चाहते थे कि मैं पढ़-लिखकर एक कामयाब इंसान बन सकूँ। भैया आप जहाँ भी होंगे खुश होंगे, आपका आशीर्वाद हम सभी पूरे परिवार को निरन्तर प्राप्त होता है। आपका आशीर्वाद और आपका दिखाये रास्ते को हम सभी कभी भूल नहीं सकते, यह आजीवन प्रेरणा रहेगा। ये आँख तो सभी परिवार के सामने रोता नहीं, परन्तु अकेले में आँख और दिल दोनो डबडबा जाता है। आपका आशीर्वाद हम सबके साथ हमेशा है, यही हमारे लिए ताकत है।

गरीबी अभिशाप नहीं, बन सकता है वरदान – आर के श्रीवास्तव।

आरके श्रीवास्तव का जन्म बिहार के रोहतास जिले के बिक्रमगंज में एक गरीब परिवार में हुआ। उनके पिता एक किसान थे, जब आरके श्रीवास्तव पांच वर्ष के थे तभी उनके पिता पारस नाथ लाल इस दुनिया को छोड़ कर चले गए। पिता के गुजरने के बाद आरके श्रीवास्तव की माँ ने इन्हें काफी गरीबी को झेलते हुए पाला पोषा। आरके श्रीवास्तव को हिंदी माध्यम के सरकारी स्कूल में भर्ती कराया। उन्होंने अपनी शिक्षा के उपरांत गणित में अपनी गहरी रुचि विकसित की। जब आरके श्रीवास्तव बड़े हुए तो फिर उनपर दुखो का पहाड़ टूट गया, पिता की फर्ज निभाने वाले एकलौते बड़े भाई शिवकुमार श्रीवास्तव भी इस दुनिया को छोड़ कर चले गए। अब इसी उम्र में आरके श्रीवास्तव पर अपने तीन भतीजियों की शादी और भतीजे को पढ़ाने लिखाने सहित सारे परिवार की जिम्मेदारी आ गयी। अपने जीवन के उतार चढ़ाव से आगे निकलते हुए आरके श्रीवास्तव ने 10 जून 2017 को अपनी बड़ी भतीजी की शादी एक शिक्षित सम्पन्न परिवार में करके एक पिता का दायित्व निभाया। आज पूरा देश आरके श्रीवास्तव के संघर्ष की मिसाल देता है। कभी न हारने का संघर्ष। आरके श्रीवास्तव हमेशा अपने स्टूडेंट्स को समझाते है कि “जीतने वाले छोड़ते नहीं, छोड़ने वाले जीतते नहीं”। उन्होंने अपने शिक्षा के दौरान संख्या सिद्धांतों के आधार पर 1000 वर्ष के कैलेंडर बना दिया।

सिर्फ 1 रुपया गुरु दक्षिणा लेकर गणित पढ़ाते है मैथमेटिक्स गुरु फेम आरके श्रीवास्तव

मैथमेटिक्स गुरु फेम आरके श्रीवास्तव चुटकले सुनाकर खेल-खेल में पढ़ाते हैं गणित। मशहूर शिक्षक मैथमेटिक्स गुरु फेम आरके श्रीवास्तव जादुई तरीके से गणित पढ़ाने के लिए जाने जाते हैं। उनकी पढ़ाई की खासियत है कि वह बहुत ही स्पष्ट और सरल तरीके से समझाते हैं। सामाजिक सरोकार से गणित को जोड़कर, चुटकुले बनाकर सवाल हल करना आरके श्रीवास्तव की पहचान है। कबाड़ की जुगाड़ से वेस्ट मटेरियल से खिलौने बनाकर गणित पढाने की कला लाजवाब है। गणित के लिये इनके द्वारा चलाया जा रहा निःशुल्क नाईट क्लासेज अभियान पूरे देश मे चर्चा का विषय बना हुआ है। इस क्लास को देखने और उनका शैक्षणिक कार्यशैली को समझने के लिए कई विद्वान इनका इंस्टीटूट देखने आते है। नाईट क्लासेज अभियान हेतु स्टूडेंट्स को सेल्फ स्टडी के प्रति जागरूक करने और गणित को आसान बनाने के लिए यह नाईट क्लासेज अभियान अभिभावकों को खूब भा रहा। आपको बताते चले कि अभी तक आरके श्रीवास्तव के द्वारा 200 क्लास से अधिक बार पूरे रात लगातार 12 घण्टे स्टूडेंट्स को निःशुल्क गणित की शिक्षा दी जा चुकी है जो आगे जारी भी है।

इसके लिए आरके श्रीवास्तव का नाम वर्ल्ड बुक ऑफ रिकार्ड्स, एशिया बुक ऑफ रिकार्ड्स, इंडिया बुक ऑफ रिकार्ड्स में दर्ज हो चुका है। आरके श्रीवास्तव गणित बिरादरी सहित पूरे देश मे उस समय चर्चा में आये जब इन्होंने क्लासरूम प्रोग्राम में बिना रुके पाइथागोरस थ्योरम को 50 से ज्यादा अलग-अलग तरीके से सिद्ध कर दिखाया। आरके श्रीवास्तव ने कुल 52 अलग अलग तरीको से पाइथागोरस थ्योरम को सिद्ध कर दिखाया, जिसके लिए इनका नाम वर्ल्ड बुक ऑफ रिकार्ड्स लंदन में दर्ज चुका है।

वर्ल्ड बुक ऑफ रिकार्ड्स लंदन के छपी किताब में यह जिक्र भी है कि बिहार के आरके श्रीवास्तव ने बिना रुके 52 विभिन्न तरीकों से पाइथागोरस थ्योरम को सिद्ध कर दिखाया। इसके लिए ब्रिटिश पार्लियामेंट के सांसद वीरेंद्र शर्मा ने आरके श्रीवास्तव को इनके उज्ज्वल भविष्य के लिए बधाई एवं शुभकामनाये भी दिया। इसके अलावा आरके श्रीवास्तव संख्या 1 क्या है, पर शैक्षणिक सेमिनार में घण्टो भाषण देकर अपने प्रतिभा से बिहार को गौरवान्वित कराया।

आरके श्रीवास्तव गणित को हौवा या डर होने की बात को नकारते हैं। वे कहते हैं कि यह विषय सबसे रुचिकर है। इसमें रुचि जगाने की आवश्यकता है। अगर किसी फॉर्मूला से आप सवाल को हल कर रहे हैं तो उसके पीछे छुपे तथ्यों को जानिए। क्यों यह फॉर्मूला बना और किस तरह आप अपने तरीके से इसे हल कर सकते हैं। वे बताते हैं कि उन्हें बचपन से ही गणित में बहुत अधिक रुचि थी जो नौंवी और दसवी तक आते-आते परवान चढ़ी।

आरके श्रीवास्तव अपने पढ़ाई के दौरान टीबी की बीमारी के चलते नहीं दे पाये थे, आईआईटी प्रवेश परीक्षा। उनकी इसी टिस ने बना दिया सैकड़ो स्टूडेंट्स को इंजीनयर। आर्थिक रूप से गरीब परिवार में जन्मे आरके श्रीवास्तव का जीवन भी काफी संघर्ष भरा रहा।

आरके श्रीवास्तव सिर्फ 1 रुपया गुरु दक्षिणा लेकर पढ़ाते है गणित, प्रत्येक अगले वर्ष 1 रुपया अधिक लेते है गुरु दक्षिणा।सैकड़ो आर्थिक रूप से गरीब स्टूडेंट्स को आईआईटी, एनआईटी, बीसीईसीई में सफलता दिलाकर बना चुके है इंजीनियर। वे कहते हैं कि मुझे लगा कि मेरे जैसे देश के कई बच्चे होंगे जो पैसों के अभाव में पढ़ नहीं पाते।

आरके श्रीवास्तव अपने छात्रों में एक सवाल को अलग-अलग मेथड से हल करना भी सिखाते हैं। वे सवाल से नया सवाल पैदा करने की क्षमता का भी विकास करते हैं। रामानुजन और वशिष्ठ नारायण सिंह को आदर्श मानने वाले आरके श्रीवास्तव कहते हैं कि विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के युग में गणित की महत्ता सबसे अधिक है इसलिए इस विषय को रुचिकर बनाकर पढ़ाने की आवश्यकता है।

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