“कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना- रामायण और महाभारत”

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संसार में मृत्यु के सिवा कुछ भी अकाट्य नहीं। सर्वस्व न्यौछावर करने वाले लोगों के बारे में भी लोग कुछ-न-कुछ आलोचना जरूर करते। कहने वाले बिना कुछ कहे रूकते नहीं। इस संकट काल में सरकार द्वारा घर में बन्द लोगों की मांग पर (जैसा कि कहा जा रहा है) रामायण और महाभारत जैसी ऐतिहासिक एवं धार्मिक महाकाव्य का टेलीविजन पर पुनः प्रसारण किया जाने लगा। इस बात को लेकर बहुत से लोगों के पेट में दर्द आरंभ हो गया और उनके दर्द की तड़पन सोशल मीडिया पर ट्रेंड करने लगा। किसी ने इसे विज्ञान बनाम कूपमण्डूकता का नाम दिया, तो कुछ ने इसे धर्मनिरपेक्षता पर एक और प्रहार माना। कुछ ने तो इसे सरकार की अकर्मण्यता से जोड़ते हुए उनके मुलाजिमों द्वारा रामायण देखते हुए शेयर किए गए स्नेप को आधार बनाकर कोरोना संकट की भयावहता के लिए उन्हें जिम्मेदार तक साबित कर दिया। कुछ ने सरकार को ही कर्त्तव्यहीन बताया।

रामायण और महाभारत भारतीय अस्मिता से जुड़ा है और इसके प्रसारण की सूचना पाकर अधिकांश लोग बेहद खुश हैं और सरकार के इस निर्णय की सराहना भी कर रहे हैं।व्यक्तिगत रूप से मुझे यह निर्णय अत्यंत प्रशंसनीय लगा।घरों में बंद लोगों में सकारात्मकता लाने हेतु यह एक अच्छा कदम है। रामायण एवं महाभारत हमारी अध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक धरोहर है। जिसमें जीवन के अलग-अलग पहलुओं को बड़ी सूक्ष्मता से उकेरा गया है। यदि इससे कुछ सीख मिलती है तो इसमें कोई बुराई नहीं है। इसका धार्मिक पहलू अत्यंत व्यापक एवं सार्थक है।

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धर्म एवं विज्ञान कभी एक-दूसरे का विरोधी नहीं रहा है। यदि ऐसा होता तो विज्ञान की लोकप्रियता एवं उपलब्धियों के साथ धर्म का प्रभाव कम होता जाता।

आखिर धर्म है क्या?

संसार इतना व्यापक शब्द है धर्म। दुनियां की सारी साकारात्मक शक्तियों का श्रोत ही धर्म का मूल है। जितनी भी कल्याणकारी एवं मानवीय विचारधारा है उनके रास्ते धर्म से जुड़े हैं। हर मानव को धार्मिक होना चाहिए न कि धर्मान्ध। आज विश्व को सबसे बड़ा खतरा धर्मांधता से है।धर्मान्ध व्यक्ति अपने धर्म को श्रेष्ठ एवं अन्य विचारधारा को निकृष्ट मानता है, समस्या यहीं से शुरू होती है।

भारत में धर्मनिरपेक्षता के नाम पर एक विनाशकारी वर्ग का उदय हुआ है जो अति स्वार्थी एवं प्रपंची है। भारत को वास्तविक चुनौती इन्हीं लोगों से है। धर्मनिरपेक्षता के नाम पर इनके सारे अपराध क्षम्य है। ये लोग नैतिकता के नाम पर सबसे ज्यादा अनैतिक कार्य करते हैं। रामायण और महाभारत जैसे धरोहर के प्रसारण को लेकर यही लोग सबसे ज्यादा विवाद खड़ा कर रहे हैं।

उपरोक्त लेख कोशी की आस टीम को भारत सरकार के रेल मंत्रालय में कार्यरत प्रतापगंज, सुपौल के “विजेंद्र जी” ने भेजा है।
(यह लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं)

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