क्या कोरोना संकट की वजह से लॉक-डाउन ने लोगों को चिंतन एवं सृजन के लिए मजबूर किया है?

0
72
- Advertisement -

स्पेशल डेस्क

कोशी की आस@पटना

- Advertisement -

प्रलयंकारी कोरोना महामारी ने लोगों को घर में बंद रहने को मजबूर किया है। इस संकट ने आमजन को मानसिक रूप से भी बीमार कर दिया है। इससे उबरने के लिए हमें चिंतन एवं सृजन का सहारा लेना चाहिए। देखा जाए तो सूचना प्रधान इस युग में हम सब अति सूचना प्रवाह के शिकार हो रहें हैं। हर कोई सूचना संग्रह में लगे हैं एवं अपने को अद्यतन रखना चाहते हैं या उसके लिए संघर्ष करते दिखते हैं। जबकि सूचनाओं के महासागर में बहुत कम चीजें हमारे जरूरत की होती है।

इन्टरनेट एवं 24*7 चलने वाली टेलीविजन व सोशल मीडिया ने लोगों को अतिव्यस्त कर दिया है। जिसे कोई काम नहीं भी हो, वो भी इतना व्यस्त है कि अपने दैनिक कार्य को मुश्किल से कर पाते हैं। जिसके कारण अनियमित जीवन-शैली की वजह से अधिकांश लोग बीमार हैं या उस ओर तेजी से बढ़ रहें है‌। भारत जैसे विकासशील देश में हाल के वर्षों में गलत खान-पान व अनियमित दिनचर्या के कारण बीमार होने वाले लोगों की संख्या में बेतहाशा वृद्धि हुई है।

अब कोरोना संकट में ढेरों नकारात्मक खबरों के बीच कुछ साकारात्मक विचार की चर्चा। इस संकट में बहुत से लोग अपने घर में भी कैदी के समान महसूस कर रहें हैं। उन लोगों से विनम्र निवेदन है कि अपने इस महत्वपूर्ण पल को आप सृजन के कार्य में लगाएं। सृजन का वह कार्य कुछ भी हो सकता है जिससे कि आपको साकारात्मक ऊर्जा मिले।

सूचना प्रधान इस संसार में चिंतन का अभाव होते जा रहा है। जिसकी वजह से उत्कृष्ट लेखन एवं रचना का कहीं न कहीं अभाव महसूस होता है। अतः हम सभी को फुरसत के इस क्षण में अपने बौद्धिक ज्ञान का भरपूर इस्तेमाल करना चाहिए।

हाल के वर्षों में देखा गया है कि मानवीय व नैतिक दृष्टि से हर स्तर पर हमारा क्षरण हुआ है। इसमें  अपवादस्वरूप कल्याणकारी वैज्ञानिक उपलब्धियों एवं अनियंत्रित जनसंख्या वृद्धि को शामिल नहीं किया जा सकता।

अब मैं एक अतिमहत्वपूर्ण पहलू अनुशासन की बात करूंगा।विगत कुछ वर्षों में देखा गया है कि हर स्तर पर अनुशासन में भारी कमी आई है, जबकि अनुशासन के बिना हम किसी भी व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने की कल्पना भी नहीं कर सकते। आज व्यक्तिगत अनुशासन में क्षरण के परिणामस्वरूप परिवारिक और सामाजिक अनुशासन का भी अवमूल्यन हुआ है। जिसका असर हर क्षेत्र में स्पष्ट रूप से देखा व अनुभव किया जा सकता है। आज हर एक संवेदनशील आम इंसान इस कमी को शिद्दत से महसूस करने के बाद भी अपने को विवश पाता है। लाख उपलब्धियों एवं सुविधाओं के बाद भी हम प्रत्येक स्तर पर अराजकता एवं अव्यवस्था के शिकार हो रहे हैं। एक तरह से अवमूल्यन एवं अवनति के इस दौर में हम सब को इस पर विचार करना चाहिए कि आखिर हम क्या खोते जा रहे हैं? क्या इस अवस्था के लिए प्रकृति का अत्यधिक दोहन एवं उनके नियमों के साथ छेड़छाड़ के नतीजों का शिकार तो नहीं हो रहें हैं। आएं चिंतन करें………..

उपरोक्त लेख कोशी की आस टीम को भारत सरकार के रेल मंत्रालय में कार्यरत प्रतापगंज, सुपौल के विजेंद्र जी ने भेजा है।

- Advertisement -