लोकतंत्र के चौथे स्तंभ का गिरता स्तर, क्या सिर्फ पैसे के लिए होती है पत्रकारिता?

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क्या सिर्फ पैसे के लिए होती है पत्रकारिता? या एक सभ्य समाज की स्थापना में भी इनकी भूमिका होती है? यहआज के दौर में मीडिया की भूमिका के विभिन्न रूपों के उजागर होने के कारण एक अहम सवाल हो गया है।

कुछ बड़े मीडिया घरानों के पत्रकारों को छोड़ दें तो जमीनी स्तर पर कुछ इसी तरह की बातें लोगों से सुनने को मिलती है। क्योंकि वर्तमान दौर में पत्रकारिता के लिए न तो योग्यता की बंदिश रही और न ही अनुभव की। जब मन हुआ तब पत्रकारिता शुरू कर दिया। खासकर जिले से लेकर प्रखंड और पंचायत स्तर पर पत्रकारिता का एक नया दौर शुरू हो गया है। जिसके लिए न तो शब्दों की मर्यादा प्राथमिकता रही और न ही संबंधित विषयों का चुनाव। अब तो कैमरे और कलम का काम भी अकेले मोबाइल कर देता है। यही तो खासियत है कि महत्वपूर्ण जानकारियां भी मोबाइल ही दे देता है। लिखने नहीं आता है तो कोई बात नहीं, गूगल है, तो सब कुछ संभव है। यह क्रांति फोर जी नेटवर्क आने के बाद हुई है। सबसे खराब स्थिति तो ऑन लाइन सोशल मीडिया चैनल के लगातार बढ़ रहे सक्रियता से होने लगी है। घर बैठे खुद एडिट, कंपोज और पेस्ट की प्रक्रिया से नए नए चैनल लोगों के मनोरंजन का साधन बन गया है।

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बड़े मीडिया घरानों में इस लेवल के पत्रकारों की क्या स्थिति है? वो किसी से छुपा नहीं है। लेकिन इसके दूसरे पहलू को देखें तो बड़े मीडिया घरानों में हर खबरों को देखने के लिए संपादक और एडिटर काम करते हैं। जिसके जांच के बाद ही कोई भी खबर लोगों तक पहुचाई जाती है। वर्तमान में उग आए हजारों ऐसे मीडिया में जो सोशल मीडिया या अन्य से संबंधित है अधिकांश में वो बात नहीं रह गई है। नतीजा यह हो रहा है कि उन पत्रकारों द्वारा लिखी गयी हूबहू बातें लोगों तक पहुंच जाती है जो कभी कभी हास्य का विषय भी बन जाता है। प्रतिस्पर्धा के इस दौर में खबरों को भेजने की इतनी जल्दबाजी होती है कि शहर की तमाम हलचल अब मिनटों में सैकड़ों लोगों तक पहुंच जाती है, यह बड़ी बात है। क्योंकि बड़े घराने बहुत खबरों को तबज्जो नहीं देते जिसके लिए यह क्रांति भी जरूरी है। पर संबंधित खबर की विश्वसनीयता सिर्फ प्रकाशित करने वाले ही जानते हैं, यह दुर्भाग्य है। कभी कभी भ्रामक खबर भी लोगों को गुमराह कर रही है। सबसे दुखद और चिंतनीय बात यह है कि इन दिनों कथित नए मीडिया वालों का यह दौर चल रहा है कि हर खबर पर उन्हें उगाही करनी है, जिसमें रिपोर्टर की भी भूमिका कम नहीं है।

वैसे अधिकांश इन तथाकथित पत्रकारों को न तो मानदेय दिया जाता है और न मजदूरी, ऐसे में बेरोजगार नौजवान इसके जाल में फंसते जाते हैं और मोटी मोटी राशि कभी विज्ञापन के नाम पर तो कभी पेड न्यूज के नाम पर उन मीडिया घरानों को भेजते रहते हैं। हालांकि इसमें हमारे पत्रकार भाई कमीशन पा लेते हैं जो ना काफी है। कुछ भी हो, कुछ अच्छा तो, कुछ बुरा सभी कार्यों का परिणाम होता है। एक साथ सबों को खुश नहीं किया जा सकता है। ऐसे में योग्य लोगों द्वारा इस दिशा में थोड़ी मेहनत और की जाती तो तस्वीर बेहतर होने की उम्मीद हो सकती है। इन्हीं आशाओं के साथ सभी पत्रकार बंधु को शुभकामना।

सहरसा से भार्गव भारद्वाज की खास रिपोर्ट

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