भूल गए थे हम, अहंकार खुद में लिए डूब गए थे हम

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परमात्मा जो प्रकृति है,
प्रकृति जो सब में है,
आस्था जो परमात्मा है,
निष्ठा और प्रेम जो सब में है,

भूलवश हम भूल गए थे,
अहंकार खुद में लिए डूब गए थे,

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आज का परिणाम ये क्या निकल रहा है,
अपने ही सोच में इंसान फिसल रहा है,

घर, परिवार, समाज, देश,
राग, नफरत, हिंसा, द्वेष,

वक्त आ गया है सम्भलने का,
एक दूजे के भावनाओं को समझने का,

अहंकार से दूर हट कुछ सदी पूर्व देखो,
राम रहीम के कर्म देखो,
गीता और कुरान पढ़ो,
बुद्ध और महावीर को देखो,
उनके बताए राह पर चलो,

हमें राह दिखाने को परमात्मा ने रची यह खेल है,
अब प्रकृति और पवन मुस्करा रही है,
हिमालय सुंदरता ओढ़ शरमा रही है,
सागर-महासागर, चांद-गगन को चूम रही है,
उन्मुक्त गगन में रंग बिरंगी पंछी उड़ रही है,
बरसों बाद गंगा अपने रंगों में लौट आयी है,
उपवन में खुशबू लिए फूल,
तितली संग झूम रही है,
अब घर, मंदिर चारो दिशाओं में,
घन्टी, शंख, धूप, दीप, मंत्र चल रही है,
अब सभी के दिलों में स्नेह प्रेम का वास है,

प्रकृति की इस रहस्य को समझ, अब भी समय है,
हम नज़रिया बदलें, नज़ारे खुद बदल जाएंगे।

उपर्युक्त पंक्तियों को लयबद्ध कर कोशी की आस टीम को प्रेषित किया रांची, झारखंड से करुणा सिंह कल्पना ने।

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