“डर लगता है”

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प्रिया सिन्हा
कोसी की आस@साहित्य

इंसान को इंसान से डर लगता है,
आखिर ना जाने क्यों उसे ?
दुनिया जहान से डर लगता है !

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चाहता तो है वो खुलकर ही करना बयां;
कड़वे सत्यों को प्रत्येक अपनों से सदा;
पर उनके अपने हो जाएं ना कहीं खफा;
उसे अपने कड़वे जुबान से डर लगता है ।

इंसान को इंसान से डर लगता है,
आखिर ना जाने क्यों उसे ?
दुनिया जहान से डर लगता है !

जानते हुए किसी के बुरी आदतों को भी;
करता नहीं वो उससे फिजूल बहस कभी;
कर ना दें बेईज्जत बेमतलब में कोई कहीं,
उसे अपने ऐसे अपमान से डर लगता है !

इंसान को इंसान से डर लगता है,
आखिर ना जाने क्यों उसे ?
दुनिया जहान से डर लगता है !

सहता है अकेले हीं लाख दर्द – ओ- मुसीबत;
पर लेता नहीं वो किसी अपने पराए की मदद;
कहीं भूल ना जाए भूल से कोई अपनी अदब;
उसे ऐसे मददगार मेहरबान से डर लगता है !

इंसान को इंसान से डर लगता है,
आखिर ना जाने क्यों उसे,
दुनिया जहान से डर लगता है ?

चाहता तो है वो खुलकर उड़ना सदा शान से;
अपने मजबूत इरादों और अपनी पहचान से;
पर धोखे से गिरा ना दे कोई उसे आसमान से,
उसे ऐसे छली-कपटी बेईमान से डर लगता है !

इंसान को इंसान से डर लगता है,
आखिर ना जाने क्यों उसे,
दुनिया जहान से डर लगता है ?

पर डरते नहीं कुछेक इंसान कोई भी इंसान से;
चलते हैं वो तो हमेशा हीं अपना सीना तान के;
करते नहीं बुरा किसी भी बुरे का कभी जान के,
क्योंकि उन्हें अपने भगवान से डर लगता है !

इंसान को इंसान से डर लगता है,
आखिर ना जाने क्यों उसे ?
दुनिया जहान से डर लगता है !

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