धड़कने कब से दे रही है सदां

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धड़कने कब से दे रही है सदां,
क्यूँ नहीं सुनता तू धड़कनों की सदां।

ओ जनम-जनम के साथी,
आ भी जा, आ भी जा, आ भी जा,

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जाना है तुझे ही इन धड़कनों ने कब से,
देखा ना तुझे था इन आँखों ने जब से,

सुन ज़रा हवाओं से भेजी है ये पैगाम,
खोल अपने मन का द्वार, पलकें तो उठा,

ओ जनम जनम के साथी,
आ भी जा, आ भी जा, आ भी जा,

फुर्सत तो निकाल, सुन तो ले धड़कनों की सदा,
इंतजार करते करते, अब हूँ पहाड़ों से भी दूर कहीं,

एक बार नज़रें तो उठा, सुन तो ले तू मेरी इल्तज़ा,
मैं हूँ अभी यहीं तेरे करीब, देख तो ज़रा,

धड़कनें कब से दे रही है सदां,
क्यूं नहीं सुनता धड़कनों की सदां,

ओ जनम जनम के साथी,
आ भी जा, आ भी जा, आ भी जा।

उपर्युक्त पंक्तियों को लयबद्ध कर कोशी की आस टीम को प्रेषित किया रांची, झारखंड से करुणा सिंह कल्पना ने।

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