“हाँ बदल रही हूँ मैं”

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“हाँ बदल रही हूँ मैं”

“मुश्किलों के साये में तो हर-रोज पल रही हूँ मैं;
उबरने को अंधेरों से अंधेरे में हीं चल रही हूँ मैं;
गिराने की कोशिश की है वक्त ने कई बार मुझे,
परन्तु गिरते-गिरते अब तनिक संभल रही हूँ मैं।।

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करने को पार सभी संघर्षों को जीवन से अपने,
विकट स्थितियों-परिस्थितियों में ढ़ल रही हूँ मैं;
बना दिया है सख्त हालातों ने मुझे तो बाहर से,
लेकिन अंदर हीं अंदर हर-क्षण पिघल रही हूँ मैं।।

ले रहीं हैं कठिनाईयाँ हर-रोज हीं इम्तिहान मेरा,
रोकर-हंसकर जैसे-तैसे बाहर निकल रही हूँ मैं,
करने को सदा अपने तमाम लक्ष्यों को हासिल,
कभी इसमें असफल तो कभी सफल रही हूँ मैं;
लोग कहते हैं अक्सर कि वक्त परिवर्तनशील है,
तो हाँ कभी अपने बुरे वक्त को तो कभी खुद को ,
वक्त के साथ सचमुच में हीं अब बदल रही हूँ मैं !!”

उपर्युक्त पंक्तियाँ पूर्णियाँ की “प्रिया सिन्हा” ने कोशी की आस टीम को भेजी हैं, ज्ञात हो कि “प्रिया सिन्हा” को विपरीत परिस्थितियों में भी साहित्य के क्षेत्र में बेहतरीन कार्य के लिए अबतक कई पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है।

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