मैं शायर हूँ साहब दर्द लिखती हूँ

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मैं शायर हूँ साहब दर्द लिखती हूँ ।
कुछ सवाल लिखती हूँ,
कुछ जवाब लिखती हूँ ,
बशर्ते कुछ इत्तेफाक लिखती हूँ।

दुनिया की काली सच्चाई,
कुछ बेइंतिहाई लिखती हूँ।
दर्द छलकती आंखों से मुस्कुराहटें लिखती हूँ।
अपनी पुरानी शरारतें, कुछ करामतें लिखती हूँ।
यारो की बातें लिखती हूँ,
कुछ शिकायते लिखती हूँ।
कुछ बातें खट्टी-मीठी लिखती हु।
कुछ सच लिखती हूँ,
कुछ झूठ लिखती हूँ,
संसार में मची हुई लूट लिखती हूँ।
कुछ काज़ लिखती हूँ,
कुछ साज़ लिखती हूँ,
कुछ दफ़्न राज़ लिखती हूँ ।
कुछ प्रभा लिखती हूँ,
कुछ सांझ लिखती हूँ,
कुछ खुद में खुद को कसे हुए तांझ लिखती हूँ।
महफ़िल में हँसते-हँसते अनहोनियाँ सुनाती हूँ,
मैं शायर हूँ साहब ,
हर गम को अपनी स्याही संग पी जाती हूँ…।✒️✒️

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उपर्युक्त पंक्तियों को लयबद्ध कर वारासिवनी, मध्यप्रदेश से वेदिका मिश्रा ने कोशी की आस को प्रेषित किया है।

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