मजदूर का बोझ

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अच्छा सुनो…!
बोझ उठाए हुए मजदूर को देखा है..!
आधे शरीर से झुक जाता है..
खुद से कई गुना अधिक होता है,
पीठ पर लदी बोरी का वजन।
पर ये भार तो बस वो भार है,
जो संसार को दृश्य होता है।
जो केवल उसकी देह को झुकाता है।

पर उस बोझ को भी देखा किसी ने!
जिसके तले, उसकी आत्मा
इच्छाएं, जरूरत, उसके सपने
सभी, झुक कर बौने हो गए हैं।
अब तो सिर भी नहीं उठाते ये सब
सिमट कर रह गए हैं थोड़े से।
भूख से बेहाल, मुर्झाए अधमरे से।
इतना अधिक है उसकी बेबसी का बोझ।

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कोशिश करना किसी मजदूर के
इस अनदेखे बोझ को ढोने की कभी..।
या फिर कर सको तो कम करना
उसकी बेबसी के बोझ को, ताकि
उसकी आत्मा, इच्छाएं, जरूरत
उसके सपने सिर उठा सकें
और देख सकें एक खुला आसमान
अपने मालिक की बोझिल आंखों से..।

श्रीमती दिव्या त्रिवेदी, जो पूर्णियाँ से ताल्लुकात रखतीं हैं, ने उपर्युक्त शब्दों को पंक्तियों में पिरोकर “कोशी की आस” को प्रेषित किया है। आपको बताते चलें कि श्रीमती त्रिवेदी की कई रचनायें पूर्व में भी प्रकाशित हो चुकी है।

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