माना अवसाद हम सब पर हावी है

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माना अवसाद हम सब पर हावी है,
ये रात बहुत ही गहरी काली है,
निवीड़ निशा तम भारी है,
निराशा के बादल छाये हुए चहू ओर है,
पर भूल मत ये विपदा तूने खुद बुलाई है।।

करने चला था प्रकृति विजय, रे मूर्ख तू,
औकात उसने तुझे तेरी बता दी है,
कर जोड़ माँ धरा से अब, मांग क्षमा तू,
नर है ना निराश कर, खुद को,
देख काली रात के बाद ही,
सुबह की पौ फटती है,
आशा का सूरज फिर
पूरब से ही निकलता है।।

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हे पूरब वासी,
विश्वगुरु भारत की संतान है तू,
अमर ऋषियों का वंशज।।
ले संकल्प आज,
उठा महत्तम दायित्व,
सारे विश्व में कर,
उनकी वाणी का पुन: प्रसार,
संयम, सहस्तित्व का संदेश,
फैला दे निखिल विश्व में,
फिर एक बार।।

उपर्युक्त रचना रांची वीमेंस कॉलेज, रांची में व्याख्याता के पद पर कार्यरत डॉ. मीता वर्मा भाटिया ने कोशी की आस को प्रेषित किया है।

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