जानिए एशिया के सबसे स्वच्छ गांव ‘ मावल्यान्नांग ‘

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भारत के उत्तर पूर्व में स्थित मेघालय जिसे बादलों का घर भी कहा जाता है, अपनी विभिन्न भौगोलिक दशाओं के कारण प्रसिद्ध है। दुनिया में सबसे अधिक वर्षा वाला स्थान “मासिनराम” मेघालय में है, साथ ही यह राज्य गारो , खासी और जैंतिया पहाड़ी के कारण भी प्रसिद्ध है लेकिन पिछले कुछ वर्षो से मेघालय की राजधानी शिलोंग से तकरीबन 80 किमी दूर एक गांव है जो काफी चर्चा में है उसका नाम है- मावल्यान्नांग, जिसे स्वच्छता के लिए सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि एशिया का सबसे स्वच्छ गांव चुना गया है।

आइए जानते हैं इस गांव की कुछ खास बातें-

मेघालय की राजधानी शिलांग से करीब 80 किलोमीटर दूर है डाउकी हाईवे । हाइवे के दोनों और लगभग 18 किलोमीटर दूर तक फूल पत्ते लगे हुये हैं। आगे बढ़ने पर तेजपत्ते के पेड़ से घिरा बांग्लादेश की सीमा शुरू होती है जहाँ एक छोटा सा गांव मावल्यान्नांग। ये कोई साधारण गांव नहीं है बल्कि इसे एशिया का  सबसे स्वच्छ गांव चुना गया है। स्वच्छता की अलख  जगा चुका यह गांव निर्मल भारत या स्वच्छ भारत अभियान से बहुत पहले ही जाग चुका है। मेघालय के ईस्ट खासी हिल्स जिले में स्थित यह गांव पहली बार 2003 में तब चर्चा में आया जब प्रतिष्ठित मैग्ज़ीन डिस्कवर ने इसे देश का सबसे स्वच्छ गांव घोषित किया। फिर 2005 में इसी पत्रिका ने इसे एशिया के सबसे स्वच्छ गांव का खिताब दिया। इस गांव को “ईश्वर का बगीचा”  भी कहा जाता है।

करीब 550 लोगों की आबादी और 98 मकानों वाले इस गांव में स्वच्छता जैसे लोगों का जुनून और मिशन है। ख्याति इस कदर हो चुकी है कि ये गांव अब एक पर्यटक स्थल के रूप में उभर गया है। लगभग हर घर में अतिथि सत्कार  के लिए होम कॉटेज कि व्यवस्था है। स्वच्छता यहाँ के लोगों के जेहन में प्रवेश कर चुकी है ।

 

गांव के बुजुर्ग से लेकर छोटे-छोटे बच्चे तक अपने घर और गांव को साफ रख रहे हैं। महिला प्रधान खासी जनजाति वाले गांव में प्रतिदिन पांच लोग सड़क से पेड़ों की एक-एक पत्ती तक उठाते हैं। करीने से बने घरों के बाहर फूल और बांस के बने कूड़ेदान हर कहीं दिख जाते हैं। यहाँ सड़क पर पेड़ का पत्ता पड़ा होने को लोग अपने लिए शर्मिंदगी समझते हैं।

सप्ताह में एक दिन सभी लोग झारू लागते हैं और साल में एक बार पूरे हाइवे पर झारू लागते हैं।  इस गांव कि साक्षारता शत-प्रतिशत है और लोग विदेशी मेहमान से अँग्रेजी में भी बात कर लेते हैं । पहले यहाँ के लोगों कि आय का साधन खेती हुआ करता था लेकिन अब पर्यटन भी साधन हो गया है।

सफाई की शुरुआत  वर्ष 1988 में एक प्राइमरी स्कूल के टीचर ने की थी। तब सबसे पहले गांव में सबके घरों में टॉयलेट बनाए गए। नतीजतन 1989-90 तक सबके घरों में टॉयलेट बन गए थे। गांव में तकरीबन 400-450  रोज आते हैं।

गांव की ख्याति ऐसी है कि यहां मेघालय के मुख्यमंत्री और राज्यपाल के साथ ही देश विदेश से लोग आते हैं। कुछ घरों में तेज पत्ता के पेड़ों के ऊपर मचान बनाए गए हैं। अगस्त और सितम्बर के महीने में पर्यटक काफी आते हैं। पहले पर्यटकों को रहने में काफी दिक्कत होती थी लेकिन अब लगभग आधे घरों में गेस्ट हाउस बन गए हैं ।

गांव कि ख्याति और स्वच्छता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अक्टूबर 2015 में मन की बात में गांव का जिक्र किया था। अगस्त 2017 में ही राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने कानपुर में स्वच्छता महाभियान में इस गांव को सम्मानित किया था। अपनी स्वच्छता के लिए ये गांव समय – समय पर पुरस्कार के पात्र बनते हैं।

इस गांव में कोई भी धूम्रपान नहीं करता है। इसलिए यहाँ दुकानों पर  बीड़ी-सिगरेट नहीं मिलती है।गांव में प्लास्टिक की पन्नी प्रतिबंधित है। सिर्फ मैगी, बिस्कुट या अन्य सामान के साथ ही पन्नी आ जाती है। यहाँ के ग्रामीण बताते हैं कि वर्तमान में हमलोग गांव को सफाई के बाद सुंदर दिखने पर जोर देते हैं। इसीलिए हर घर के आगे फूल, बगीचा बना रहे हैं। बांस के कूरेदान तो हमारे यहां सालों से  इस्तेमाल हो रहे हैं।

 

Rakhi Singh

(यह लेखक के स्वतंत्र विचार हैं।)

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टीम- “कोसी की आस” ..©

 

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