मैथिली ऑनलाइन कवि सम्मेलन

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गूगल मीट के माध्यम से ऑनलाइन कवि सम्मलेन का आयोजन किया जा रहा है। कार्यक्रम में देशभर से ग्यारह कवयित्रियाँ आमंत्रित हैं। स्वघोषित मिथिलामिहिर, अनेक व्हाट्सअप ग्रुप के मूर्धन्य कवि चूड़ाकांत चौधरी चार दिनों से आयोजकों के व्हाट्सअप पर मैसेज-दर-मैसेज ठेले जा रहे थे कि हम प्रेमकविता का पाठ करेंगे। आयोजक को देख ‘चचा आपकी जितनी उम्र हो चली है, घर पर किसी पण्डित से गरुड़पुराण का पाठ करवाइए’ टाइप कर चुका है लेकिन लोकलिहाज से उसे ‘अहोभाग्य! आपकी गणमान्य उपस्थिति हमारे लिए पथप्रदर्शक का काम करेगी’ भेजना पड़ रहा है।

कवि चूड़ाकांत जी कविता पाठ को लेकर अत्यंत रोमांचित हैं। पौत्र के कमरे का एक कोना एक घण्टे के लिए हथिया चुके हैं। धर्मपत्नी से कहकर पेटी से विवाहकाल का पाग निकलवाया गया, कुर्ते में स्टार्च देकर इस्त्री करवाए हैं। कवयित्री महोदयों की ज्यादा भागीदारी देख आज पान में इलायची के साथ किमाम भी मिलवा लिए हैं।

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कवि सम्मलेन का आयोजन होने जा रहा है। पोता सुबह से इनको ट्रेनिंग दे रहा है। ईयरफोन और कान की मशीन के संतुलन को कैसे संभाला जाए, इसपर उसका ज्यादा फोकस है। अभी संचालक महोदय दरिभंगा से लाइव कवयित्री ‘सुश्री मधुवन विहारिणी’ का परिचय करवा रहे हैं। चूंकि चूड़ाकांत जी का ससुराल दरिभंगा ही है, तो उनके होठों पर जीजाभाव वाली मुस्कुराहट है। हालांकि कवयित्री महोदया उम्र में उनसे आधी हैं। अब संचालक चूड़ाकांत जी को सम्बोधित करते हुये कहते हैं-

आब अहाँ सभक समक्ष अप्पन कविता रखता प्रेमरस मार्तंड वरिष्ठ कवि चूड़ाकांत चौधरी ‘काम’

चूड़ाकांत चौधरी जी की तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं। स्क्रीन पर उनकी तस्वीर दिख रही है। वो कुछ इशारे कर रहे हैं, वो भी नज़र आ रहा लेकिन आवाज़ नदारद। पुनः आयोजक उनको आवाज़ लगा रहे कि-

चूड़ा कक्का? औ चूड़ा कक्का? हमरा सुनैत छी की ने? चूड़ा कक्का कानक मशीन ठीक सं लगाबू ने?

इतने में चूड़ाकांत जी की तरफ से आवाज़ आयी-

– हौ बूड़ि नहितन! हम्मर बहिर थोड़बे छी, सुनि रहल छीयो, तोहुँ धिएपूता सं बूड़िलेल रही गेलाह!

प्रेमरस के कवि बढ़ती उम्र और टेक्नोलॉजी के बीच समन्वय नहीं बिठा पा रहे थे। इसलिए झल्लाहट रस का प्रवाह हुआ, कवयित्रियाँ हास्य रस के भाव से ठठाकर हंस पड़ीं और संचालक महोदय को खून का घूंट रस पीकर रहना पड़ा। कार्यक्रम आगे बढ़ा, कुल 158 दर्शक इस कार्यक्रम को लाइव देख रहे थे, चूड़ाकांत जी ने अपनी कविता का पाठ करना शुरू किया।

‘प्रियतमे! आजीवन अपनेक गुणगान करब
अहाँक मधुकलश सं ज्यों मधु केरि पान करब’

उनके हाथों का इशारा और मन का भाव समझ चार कवयित्रियाँ ऑफ़लाइन हो गयीं। सपरिवार देख रहे 27 श्रोताओं ने हड़बड़ी में मोबाइल फेंक दिया। स्वयं संचालक महोदय भी हड़बड़ा गए. इन घटनाओं से अनभिज्ञ चूड़ाकांत जी अगली पंक्ति पर बढ़े.

‘भंवरा मंडराएत अनगिनत अहाँ पर
मुदा हमही ई ठोरक रसपान करब’

तीन कवियित्रियों ने इसबार विदा ले लिया। 40 श्रोताओं ने मोबाइल स्विच ऑफ कर लिया, जो कुछ बचे थे वो कमेंट बॉक्स में ‘जय मिथिला’, ‘जय जानकी’ का नारा बुलंद किए थे। वैसे कविता बुरी नहीं थी, लेकिन चूड़ाकान्त जी के वयस की कसौटी पर फिट नहीं बैठ रही थी, जब आपके कानों में मशीन लगा हो, दांत रात को टेबल पर रख दिए जाते हों तो ऐसे हालात में इस तरह के स्टंट ठीक नहीं। जब समय ने बना दिया हंगल, तब काहे का दंगल। पर चूड़ाकान्त जी तो मिथिला की मिट्टी के थे, अंतिम सांस तक हार नहीं मानने वाले, पाठ जारी रहा।

‘प्रिये, हम अल्प फलाहार सं मानब नहिं
हम त पालथी मारी सौंस जलपान करब’

चौधरीजी ने अपने उपनाम ‘काम’ को गम्भीरता से लेना शुरू किया. इससे पहले की यह गम्भीरता गहराती कवयित्रियों ने मौके की नाजुकता को समझा. वो सम्मलेन से विलीन होती गयीं. श्रोताओं के ‘जय मिथिला’, ‘जय जानकी’ उद्घोष में विराम लगा. अब स्क्रीन पर महज दो लोग ऑनलाइन दिख रहे थे. एक तो कविवर चूड़ाकांत दूजे संचालक महोदय स्वयं। संचालक महोदय ने उनको टोकते हुए कहा-

– कक्का, सब कवयित्री महोदया त ऑफलाइन भ गेल.

चूड़ाकान्त जी ढेका खोंसते हुए बोले.

– तहन चलह अपनो सब, एतअ आब की धूकबअ, बेल?

अमन आकाश
कोशी की आस@स्पेशल डेस्क

 

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