राजघाट से हल्दीघाटी विशाल पदयात्रा

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सुशांत सौरभ,नई दिल्ली,

 

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आज यमुना पार के करावल नगर पूजा कॉलोनी मुख्यमार्ग के बीच बने विशाल महाकाल मंदिर के प्रांगण में “अतुल्य भारत निर्माण सेवादल ट्रस्ट” की एक बैठक आयोजित की गई जिसमें नए सदस्य बनाने और आगामी गुरु पूर्णिमा के दिन 16 जुलाई को प्रस्तावित राजघाट से हल्दीघाटी विशाल पदयात्रा के आयोजन पर चर्चा की गई सुबह 11:00 बजे से आयोजित इस बैठक में संस्था के संस्थापक स्वामी सिद्धार्थ परमहंस ने बतौर मुख्य अतिथि अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।

 

स्वामी सिद्धार्थ परमहंस

 

इसके अलावा इस बैठक में रामगोपाल यादव, ए महावीर बंसल, जय किशन बंसल, डा. रामजन्म केवट, कुणाल प्रियदर्शी, धर्मपाल खटाना, जोगेंद्र कश्यप, अधिवक्ता रामनरेश पांडे, सलमा, सुहेल, राजू, पप्पू पंवार, राम शंकर शुक्ला, सत्येंद्र मिश्रा, कामाख्या नारायण शर्मा, अनय कुमार, सहित क्षेत्र के गणमान्य अतिथियों सहयोगियों और कार्यकर्ताओं ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। बैठक को संबोधित करते हुए गुरुदेव जी ने कहा-हम जानते हैं कि हमारा देश सहश्त्रों शताब्दियों से परतंत्रता की बेड़ियो में जकड़ा हुआ था, शारीरिक पराधीनता तो परिलक्षित होती है किंतु स्वाद स्वार्थ एवं स्वअहं की परतंत्रता अदृश्य होते हुए शारीरिक दासत्व से अधिक भयानक एवं दारुण होती है। हमने असंख्य माँ भारती के सपूतों को खोकर वर्तमान में शारीरिक दासत्व से मुक्ति पाई है किंतु आज भी जाति, धर्म, संप्रदाय, क्षेत्र, भाषा से अभी तक बंधे हुए हैं। राष्ट्रीय एकता अखंडता एवं विश्व बंधुत्व हमारा आदर्श अवश्य है परंतु हमारी निष्ठा द्वारा ऐसा आचरण में नहीं है। हम पाश्चात्य भाषा एवं संस्कृति में आकंठ डूब चुके हैं, हमारी भारतीय प्राचीन वांग्मयी संस्कृति जिसने संपूर्ण विश्व को अपने अलौकिक ज्ञान का पंथ अनुगामी बनाया, उसे हम उपेक्षित कर आखिर कौन सा आदर्श स्थापित करना चाहते हैं बरसों पहले लोग कहते थे कि देर ना हो जाए, कहीं कोई सांप और बिच्छू ना मिल जाए और आज विडंबना है कि हम कहते हैं कहीं देर ना हो जाए, कहीं कोई आदमी ना मिल जाए। यह हमारी आधुनिक मानवतावादि आदर्श समाज की महान उपलब्धि है जो संस्कृति संपूर्ण विश्व को मानवता का सच्चा पथ पौरोहित्व कर विश्व की तमाम संस्कृति और सभ्यताओं की जननी होने तथा आध्यात्मिक ज्ञान के आलोक से प्रकाशित कर विश्व गुरु, जगत गुरु के शीर्ष क्षितिज पर दृढ़ता पूर्वक आरुण हुआ। वही ज्ञान एवं तत्वदर्शन तथा आदर्श जीवन शैली द्वारा आदर्श मानव धर्म, आदर्श समाज धर्म, आदर्श राष्ट्र धर्म की स्थापना कर जीवन में पुनः स्थाई सुख शांति की स्थापना का एकमात्र विकल्प अपने देश ही में अपने वीर सपूतों द्वारा कुचला जा रहा है। हमारा देश असंख्य आतताइयों, बर्बर लुटेरों, व्यवसायियों, सभ्यताओं द्वारा क्रूर पद आक्रांताओं से लहूलुहान होता रहा है, उसके बाद भी काल के भाल पर अपनी गौरव गाथा का अमिट इतिहास अंकित कर संप्रभुता संपन्न देदीप्यमान हो संपूर्ण विश्व के आश्चर्य एवं शोध का विषय बना हुआ है।

 

 

भारत यद्यपि समय-समय पर भीतरघात एवं विश्वासघात का शिकार होकर का दास्त्तव की भयानक यंत्रणा झेलकर अपने भीषण त्याग बलिदान एवं पौरुष से अजेय बना रहा है। देश धर्म संस्कृति को विदेशी आंत, आक्रमणकारियों एवं व्यवसायियों की पराधीनता का मुख्य कारण हमारी भौतिक सौख्य के साधनों के प्रति आकर्षण “फूट डालो और राज करो” के शिकार होने के कारण देश को बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ी थी। हमारे देश में अपने साम्राज्य की स्थापना में सफल होने वाले प्रारंभ में व्यवसाई बनकर आए और हमारी स्वर्णमयी भारत वसुंधरा के हाथों से आकर्षित हुए, जिस देश पर अपना आधिपत्य स्थापित करना है, तो सर्वप्रथम वहां की सभ्यता मान्यता एवं आदर्श को धूल धूसरित करो इसी मूल मंत्र के साथ वह हमारे देश को शहस्त्रों शताब्दियों से पद दलित करते आ रहे हैं। देश की इतनी दुर्दशा के पीछे हमारा स्वार्थ, स्वाद एवं स्वयं अहंकार का उन्माद है, माँ भारती के अंतर्मुखी साधकों के भीतर स्वाभिमान का अंकुर फूटा और मतवाले होकर उन्होंने माँ भारती के चरणों में अपने सर्वस्व की भेंट चढ़ा दी बलिदान की श्रंखला बढ़ती गई कारवां अनावरत बढ़ता गया और एक दिन वह भी आ गया जब संपूर्ण विश्व में स्थापित साम्राज्य विदेशी कंपनी के शासक को हमारे सर्वोत्सर्ग के उत्साह शौर्य के समक्ष नतमस्तक होना पड़ा और वह अपना सामान बांध कर सुरक्षित निकल भागने की याचना करने लगे। बंधुओं यह सब तभी संभव हो सका जब हमने दृढ़ संकल्प पर अडिग रहकर कंधे से कंधा मिलाकर जाति, धर्म, संप्रदाय, क्षेत्र, भाषा के अहंकार से ऊपर उठकर समवेत स्वर-में-स्वर मिला कर “हम मात्र भारतीय हैं” की भावना एवं राष्ट्र सर्वोपरि है कि उद्दात आदर्श स्थापित करने के लिए झुंड-के-झुंड एकत्रित हुए और अपने स्वार्थ की भावना को त्याग कर नवभारत के इतिहास की रचना की और नव स्वतंत्र गणतंत्र की स्थापना हुई। यह ऐतिहासिक लम्हा तभी संभव हुआ जब हम एक हुए तथा देश को स्वयं से ऊपर स्थापित किया दासत्व की भीषण विभीषिका के पीछे साम-दाम-दंड-भेद प्रबोधिनी आकर्षण प्रलोभन प्रसवणी साम्राज्य स्थापना राजनीतिक षड्यंत्र को हम समझ सके। “फूट डालो और राज करो” राजनीति का अमोघ अस्त्र है जो कभी निष्फल हुआ हो इसका उदाहरण अब तक प्रस्तुत नहीं है इसी उद्देश्य को लेकर राष्ट्र को एकजुट करने का यह प्रयास हमारा संगठन कर रहा है”।

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